नागपुर में RSS का शताब्दी विजयादशमी उत्सव, मोहन भागवत बोले- राष्ट्रनिष्ठा और कर्तव्यबोध से बनेगा सशक्त समाज

“नागपुर में RSS के 100 वर्ष पूरे होने पर विजयादशमी उत्सव आयोजित हुआ। मोहन भागवत ने स्वबोध और स्वदेशी पर जोर दिया“

नागपुर, महाराष्ट्र। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का शताब्दी वर्ष का विजयादशमी उत्सव मंगलवार को नागपुर में आयोजित किया गया। संघ के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर हुए इस विशेष कार्यक्रम में सरसंघचालक मोहन भागवत और दैनिक जागरण के प्रधान संपादक संजय गुप्त प्रमुख रूप से शामिल हुए। कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस समेत कई प्रमुख हस्तियां मौजूद रहीं।

उत्सव की शुरुआत शस्त्र पूजन से हुई। इसके बाद संघ की परंपरा के अनुसार ध्वजारोहण, प्रार्थना और पथ संचलन जैसे कार्यक्रम आयोजित किए गए। समारोह में संघ की विचारधारा, राष्ट्र के प्रति समर्पण, भारतीय सांस्कृतिक पहचान और समाज को संगठित करने के प्रयासों पर जोर दिया गया।

100 वर्षों से भारतीय स्वबोध और स्वदेशी पर जोर: मोहन भागवत

सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पिछले 100 वर्षों से भारत के स्वबोध को जागृत करने और संगठित तथा सामर्थ्यवान समाज के निर्माण की दिशा में काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि संघ की विचारधारा में अपनी सांस्कृतिक पहचान, स्वदेशी आचरण और राष्ट्रीय चेतना का महत्वपूर्ण स्थान है।

भागवत के अनुसार, संघ के पंच परिवर्तन की अवधारणा का आधार भी स्वबोध, स्वदेशी जीवनशैली और सांस्कृतिक अस्मिता है। उन्होंने राष्ट्र के प्रति निष्ठा और कर्तव्यबोध को समाज के निर्माण के लिए आवश्यक बताया।

संजय गुप्त बोले- राष्ट्र के प्रति समर्पण संघ और दैनिक जागरण की साझा भावना

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि दैनिक जागरण के प्रधान संपादक संजय गुप्त ने संघ के शताब्दी वर्ष और विजयादशमी की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि संघ और दैनिक जागरण की विचारधारा में भारतीय सनातन संस्कृति, सद्भावना और राष्ट्र के प्रति समर्पण जैसे विषय महत्वपूर्ण हैं।

संजय गुप्त ने कहा कि नागरिकों में यह भावना विकसित होनी चाहिए कि वे देश के लिए क्या योगदान दे सकते हैं। उनके संबोधन में राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक मूल्यों और सामाजिक संगठन की भूमिका पर विशेष जोर रहा।

भाजपा की सफलता में संघ की विचारधारा और संगठन शक्ति का उल्लेख

संजय गुप्त ने अपने संबोधन में भारतीय जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी के विस्तार तक संघ की वैचारिक भूमिका और संगठनात्मक अनुशासन का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भाजपा के नेताओं में भारतीयता और राष्ट्रीयता से जुड़े संस्कार विकसित करने में संघ की भूमिका रही है।

उन्होंने पार्टी की राजनीतिक सफलता का श्रेय संघ की दृढ़ वैचारिकता और अनुशासन को दिया। यह उनके संबोधन में व्यक्त विचार था।

चुनौतियों के बीच संगठन के कार्य जारी रहने की बात

दैनिक जागरण के प्रधान संपादक ने कहा कि स्वतंत्रता के बाद संघ को वैचारिक विरोध और विभिन्न चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन संगठन व्यक्ति निर्माण और राष्ट्रनिष्ठा के अपने उद्देश्य पर आगे बढ़ता रहा।

उन्होंने संघ की स्थापना के उद्देश्य का उल्लेख करते हुए हिंदू समाज को संगठित और सशक्त बनाने तथा राष्ट्रीय स्वाभिमान जगाने की बात कही। उनके अनुसार, स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ मानसिक और सांस्कृतिक स्तर पर आत्मविश्वास विकसित करना भी है।

हिंदू संस्कृति और भारतीय जीवन पद्धति पर संजय गुप्त का बयान

संजय गुप्त ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक पहचान और हिंदू जीवन पद्धति को बनाए रखने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने अपने संबोधन में ऐतिहासिक पराधीनता का जिक्र करते हुए कहा कि भारतीयता और हिंदुत्व की वैश्विक पहचान को मजबूत करने का श्रेय प्रमुख रूप से संघ को दिया जाना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि शताब्दी वर्ष के बाद संघ अगले 100 वर्षों में समाज में बदलाव लाने और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से काम कर रहा है।

स्मृति मंदिर में हेडगेवार को श्रद्धांजलि

कार्यक्रम से पहले सरसंघचालक मोहन भागवत और मुख्य अतिथि संजय गुप्त ने संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के स्मृति मंदिर में उनकी प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी।

इसके बाद शस्त्र पूजन और संघ की पारंपरिक गतिविधियां आयोजित की गईं। कार्यक्रम में पथ संचलन के बाद मिश्र व्यायाम योग का आयोजन भी हुआ। शताब्दी वर्ष के कारण इस बार का विजयादशमी उत्सव संघ के लिए विशेष महत्व रखता है।

शताब्दी वर्ष में भविष्य की दिशा पर जोर

नागपुर में आयोजित इस समारोह में संघ के सौ वर्ष के सफर, सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक संगठन और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। मोहन भागवत ने स्वबोध और स्वदेशी आचरण को महत्वपूर्ण बताया, जबकि संजय गुप्त ने राष्ट्रनिष्ठा, अनुशासन और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की भूमिका पर अपने विचार रखे।

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