
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने रिश्तों में कड़वाहट आने के बाद आपराधिक मुकदमे दर्ज कराने की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताई है। शीर्ष अदालत ने शुक्रवार को कहा कि दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध केवल रिश्ता टूटने या खराब होने के बाद दुष्कर्म नहीं माने जा सकते। अदालत ने साफ किया कि रिश्ते में मनमुटाव या अलग होने का फैसला अपने आप में आपराधिक कृत्य नहीं है।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने केरल निवासी संतोष कुमार एनपी को दुष्कर्म और धोखाधड़ी के आरोपों से मुक्त करते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि आपसी सहमति से बने संबंधों और धोखे या गलत जानकारी देकर हासिल की गई सहमति के बीच कानूनी अंतर समझना जरूरी है।
हर टूटे रिश्ते को आपराधिक मामला नहीं बनाया जा सकता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी रिश्ते में दोनों वयस्कों ने अपनी मर्जी से शारीरिक संबंध बनाए हैं, तो बाद में रिश्ता खत्म होने के आधार पर उन संबंधों को पिछली तारीख से दुष्कर्म नहीं माना जा सकता।
पीठ ने कहा कि रिश्ता टूटने के बाद किसी व्यक्ति को अपने पुराने फैसलों पर पछतावा हो सकता है, लेकिन केवल पछतावे को आपराधिक मुकदमे का आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक प्रतिष्ठा पर गंभीर असर पड़ता है।
क्या किसी पुरुष को रिश्ता खत्म करने का अधिकार नहीं?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या किसी पुरुष को अपनी इच्छा से रिश्ता खत्म करने का अधिकार नहीं है? केवल रिश्ता खत्म करने के फैसले को धोखाधड़ी या छल कैसे माना जा सकता है?

अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी रिश्ते से अलग होने का फैसला अपने आप में अपराध नहीं है। साथ ही, पीठ ने कहा कि असफल प्रेम संबंधों या वैवाहिक रिश्तों के बाद दर्ज होने वाले मुकदमों में तथ्यों और परिस्थितियों की सही जांच जरूरी है।
धोखे से मिली सहमति और आपसी सहमति में अंतर
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि सभी मामलों को एक ही नजरिये से नहीं देखा जा सकता। यदि कोई व्यक्ति शुरुआत से ही धोखा देने की नीयत रखता है और गलत जानकारी देकर शारीरिक संबंध बनाने की सहमति हासिल करता है, तो मामला अलग हो सकता है।
लेकिन यदि दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से संबंध बने और बाद में रिश्ता खत्म हो गया, तो सिर्फ इस आधार पर दुष्कर्म का आरोप नहीं लगाया जा सकता। अदालत के मुताबिक, ऐसे गंभीर आरोपों के लिए जबरदस्ती, वास्तविक यौन हिंसा या सहमति से जुड़ी धोखाधड़ी जैसे कानूनी तथ्य होना जरूरी है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला केरल निवासी संतोष कुमार एनपी से जुड़ा है। उन्होंने केरल हाईकोर्ट के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने और आरोपों से मुक्त करने की मांग खारिज कर दी गई थी।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, महिला ने आरोप लगाया था कि संतोष कुमार ने अपनी पहली शादी की बात छिपाई और पहली शादी कायम रहते हुए उससे दूसरी शादी कर ली। महिला का दावा था कि आरोपी ने उसे विश्वास दिलाया कि उनका विवाह कानूनी रूप से वैध है और इसी भरोसे के आधार पर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।
महिला की पहले भी शादी हो चुकी थी और उसका तलाक हो गया था। उसने आरोप लगाया कि वर्ष 1996 से 2003 तक उसने आरोपी के साथ मैसूर में वैवाहिक जीवन बिताया। बाद में महिला ने आरोपी के खिलाफ दुष्कर्म, धोखाधड़ी और विश्वासघात के आरोप लगाए। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में आरोपों से मुक्त करते हुए रिश्तों और आपराधिक कानून के बीच अंतर को समझने की जरूरत पर जोर दिया।









