“उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव तक मौजूदा ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने के योगी सरकार के आदेश को इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में चुनौती दी गई है। अदालत ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है और मामले में आज सुनवाई होगी।“
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव से पहले ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने के राज्य सरकार के फैसले पर कानूनी सवाल खड़े हो गए हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने वर्तमान ग्राम प्रधानों को पंचायत चुनाव संपन्न होने और नए प्रधानों के चयन तक प्रशासक बनाए जाने संबंधी आदेश को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर राज्य सरकार से जवाब मांगा है।
अदालत ने राज्य सरकार के अधिवक्ता को निर्देश दिया है कि वह सरकार से आवश्यक दिशा-निर्देश प्राप्त कर तीन जून को अदालत के समक्ष अपना पक्ष प्रस्तुत करें। मामले की सुनवाई आज होने की संभावना है, जिस पर प्रदेश भर के ग्राम प्रधानों और पंचायत प्रतिनिधियों की नजरें टिकी हैं।
अवकाशकालीन पीठ ने मांगा सरकार का पक्ष
यह आदेश न्यायमूर्ति शेखर बी सर्राफ और न्यायमूर्ति ए के चौधरी की अवकाशकालीन पीठ ने पारित किया। अदालत स्थानीय अधिवक्ता प्रकाश प्रजापति द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है।
याचिका में राज्य सरकार के 25 मई 2026 के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसके तहत मौजूदा ग्राम प्रधानों को पंचायत चुनाव होने तक प्रशासक के रूप में कार्य करने की अनुमति दी गई है।
कार्यकाल बढ़ाने का लगाया आरोप
याचिकाकर्ता का तर्क है कि उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम की धारा 12(3)(क) के अनुसार ग्राम प्रधान का कार्यकाल शपथ ग्रहण की तिथि से अधिकतम पांच वर्ष तक ही हो सकता है। इसके बावजूद समय पर पंचायत चुनाव नहीं कराए गए और वर्तमान प्रधानों को ही प्रशासक नियुक्त कर दिया गया।
याचिका में कहा गया है कि इस व्यवस्था के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से ग्राम प्रधानों का कार्यकाल बढ़ाया जा रहा है, जो कानून की मंशा और संवैधानिक व्यवस्था के विपरीत है। याचिकाकर्ता ने इसे विधि विरुद्ध बताते हुए आदेश को निरस्त करने की मांग की है।
पहले अधिकारियों को बनाया जाता था प्रशासक
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि पूर्व में जब किसी कारणवश पंचायत चुनाव समय पर नहीं हो पाते थे, तब प्रशासनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए सहायक विकास अधिकारी (एडीओ पंचायत) या अन्य सरकारी अधिकारियों को प्रशासक नियुक्त किया जाता था।
याचिकाकर्ता ने अदालत से आग्रह किया है कि इस बार भी उसी परंपरा का पालन करते हुए किसी सरकारी अधिकारी को प्रशासक नियुक्त करने का निर्देश दिया जाए, न कि कार्यकाल पूरा कर चुके ग्राम प्रधानों को।
पंचायत चुनाव और ओबीसी आरक्षण से जुड़ा है मामला
प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर पहले से ही राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर गतिविधियां तेज हैं। सरकार ने हाल ही में ओबीसी आरक्षण से संबंधित आयोग की रिपोर्ट आने तक पंचायतों के संचालन के लिए वर्तमान प्रधानों को प्रशासक बनाए रखने का निर्णय लिया था। इसी आदेश को लेकर अब न्यायिक समीक्षा शुरू हो गई है।
आज की सुनवाई पर टिकी निगाहें
मामले की अगली सुनवाई आज होने वाली है। अदालत में राज्य सरकार का पक्ष सामने आने के बाद यह स्पष्ट हो सकेगा कि मौजूदा व्यवस्था जारी रहेगी या फिर पंचायतों के संचालन के लिए कोई वैकल्पिक प्रशासनिक व्यवस्था लागू की जाएगी। इस फैसले का असर प्रदेश की हजारों ग्राम पंचायतों और आगामी पंचायत चुनाव की प्रक्रिया पर पड़ सकता है।
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