भारत-म्यांमार रिश्तों को नई दिशा: पीएम मोदी ने उठाया सीमा सुरक्षा का मुद्दा, राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग ने दिया बड़ा भरोसा

नई दिल्ली में द्विपक्षीय वार्ता के दौरान म्यांमार ने कहा- उसकी जमीन भारत विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं होगी इस्तेमाल; व्यापार, सुरक्षा और लोकतंत्र बहाली पर भी हुई चर्चा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और म्यांमार के राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग के बीच नई दिल्ली में अहम बैठक हुई। दोनों नेताओं ने सीमा सुरक्षा, व्यापार, रक्षा सहयोग और लोकतंत्र बहाली पर चर्चा की। म्यांमार ने भरोसा दिलाया कि उसकी जमीन भारत विरोधी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल नहीं होगी।

नई दिल्ली। भारत और म्यांमार के संबंधों को नई मजबूती देने की दिशा में सोमवार को नई दिल्ली में महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बैठक आयोजित हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और म्यांमार के राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग के बीच हुई वार्ता में सीमा सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता, व्यापार, निवेश और लोकतांत्रिक प्रक्रिया जैसे अहम मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई।

बैठक के दौरान म्यांमार के राष्ट्रपति ने भारत को आश्वस्त किया कि उनके देश की जमीन का उपयोग किसी भी ऐसी गतिविधि के लिए नहीं होने दिया जाएगा जो भारत के सुरक्षा हितों के खिलाफ हो।

सीमा सुरक्षा और पूर्वोत्तर की चिंता पर चर्चा

भारत और म्यांमार के बीच लगभग 1,640 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा होती है। यह सीमा भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के लिए रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। लंबे समय से म्यांमार की आंतरिक अस्थिरता, सीमा पार गतिविधियों और क्षेत्र में बढ़ते चीनी प्रभाव को लेकर भारत चिंतित रहा है।

सूत्रों के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी ने वार्ता के दौरान सीमा प्रबंधन, सुरक्षा सहयोग और सीमा क्षेत्रों में शांति बनाए रखने के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। दोनों देशों ने इस बात पर सहमति जताई कि एक-दूसरे की सुरक्षा चिंताओं का सम्मान करते हुए सीमा क्षेत्र का दुरुपयोग रोकने के लिए सहयोग बढ़ाया जाएगा।

भारत विरोधी गतिविधियों पर सख्त संदेश

वार्ता के दौरान राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग ने स्पष्ट किया कि म्यांमार की भूमि का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं होने दिया जाएगा। इसे भारत की सुरक्षा चिंताओं को लेकर एक महत्वपूर्ण आश्वासन माना जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि म्यांमार के मौजूदा राजनीतिक और सुरक्षा हालात को देखते हुए यह संदेश नई दिल्ली के लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि भारत लंबे समय से पूर्वोत्तर क्षेत्र में सक्रिय उग्रवादी समूहों और सीमा पार गतिविधियों को लेकर सतर्क रहा है।

व्यापार और निवेश बढ़ाने पर सहमति

बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में दोनों देशों ने स्थानीय मुद्राओं के माध्यम से व्यापार बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की। इसके तहत रुपया-क्यात सेटलमेंट मैकेनिज्म को और प्रभावी बनाने पर जोर दिया जाएगा।

भारत और म्यांमार के बीच वर्तमान में लगभग दो अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार होता है। दोनों देशों ने कृषि प्रसंस्करण, पेट्रोलियम, ऊर्जा, खनन और बुनियादी ढांचा क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की इच्छा जताई।

इसके अलावा लंबित द्विपक्षीय समझौतों और समझौता ज्ञापनों को जल्द अंतिम रूप देने पर भी सहमति बनी।

चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच भारत यात्रा

म्यांमार की राजनीति में चीन का प्रभाव लगातार बढ़ता रहा है। विशेष रूप से दुर्लभ खनिज संसाधनों और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में चीनी निवेश की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।

ऐसे समय में राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग का चुनाव जीतने के बाद भारत को अपने प्रमुख विदेशी दौरों में शामिल करना रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इससे म्यांमार ने यह संकेत देने की कोशिश की है कि वह क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखना चाहता है और भारत के साथ संबंधों को भी प्राथमिकता देता है।

म्यांमार की आंतरिक स्थिति पर भी हुई चर्चा

म्यांमार में सैन्य शासन, लोकतंत्र समर्थक समूहों और विभिन्न सशस्त्र संगठनों के बीच लंबे समय से संघर्ष जारी है। देश के कई क्षेत्रों में अस्थिरता बनी हुई है और रखाइन सहित कुछ इलाकों में विद्रोही समूहों का प्रभाव बढ़ा है।

विदेश सचिव विक्रम मिसरी के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी ने म्यांमार में समावेशी राजनीतिक प्रक्रिया और आंतरिक शांति स्थापित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

आंग सान सू ची का मुद्दा भी उठा

वार्ता के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने म्यांमार की लोकतांत्रिक नेता आंग सान सू ची का मुद्दा भी उठाया। भारत ने एक बार फिर म्यांमार में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की शीघ्र बहाली और राजनीतिक संवाद को आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया।

भारत ने यह भी दोहराया कि वह म्यांमार की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करता है, लेकिन साथ ही वहां स्थिर, समावेशी और लोकतांत्रिक व्यवस्था की वापसी को क्षेत्रीय शांति और विकास के लिए महत्वपूर्ण मानता है।

रणनीतिक साझेदारी को मिला नया बल

विशेषज्ञों के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग के बीच हुई यह वार्ता केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरे पूर्वी और दक्षिण-पूर्व एशियाई क्षेत्र की सामरिक राजनीति पर भी पड़ सकता है।

सीमा सुरक्षा, आर्थिक सहयोग, कनेक्टिविटी परियोजनाओं और क्षेत्रीय स्थिरता के मुद्दों पर बढ़ता सहयोग भारत की ‘एक्ट ईस्ट नीति’ को नई गति देने के साथ-साथ म्यांमार के साथ रणनीतिक साझेदारी को भी मजबूत करेगा।

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