“वाराणसी के हरहुआ स्थित संत अतुलानंद कॉन्वेंट स्कूल में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर ‘मानव चरित्र निर्माण में श्रीमद्भगवद्गीता’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित हुई। कार्यक्रम में गीता के सामाजिक, नैतिक, वैज्ञानिक और राष्ट्र निर्माण संबंधी महत्व पर प्रबुद्ध वक्ताओं ने विचार व्यक्त किए।“
वाराणसी अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर संत अतुलानंद कॉन्वेंट स्कूल, हरहुआ में “मानव चरित्र निर्माण में श्रीमद्भगवद्गीता” विषयक एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य आयोजन किया गया। संगोष्ठी में देश के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े शिक्षाविदों, समाजसेवियों, विधि विशेषज्ञों और धर्मचिंतकों ने भाग लेकर गीता के संदेशों की वर्तमान समाज में प्रासंगिकता पर अपने विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम के संयोजक एवं उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के पूर्व सदस्य प्रो. आर.एन. त्रिपाठी ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय संस्कृति और नैतिक मूल्यों की जड़ें श्रीमद्भगवद्गीता में निहित हैं। उन्होंने दावा किया कि मूल भारतीय संविधान के 395 अनुच्छेदों में से 150 से अधिक अनुच्छेद भगवद्गीता के सिद्धांतों से प्रेरित हैं। उन्होंने कहा कि मौलिक अधिकारों और कर्तव्यों के संतुलन की भावना गीता के दर्शन में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है तथा एक श्रेष्ठ और सशक्त भारत का निर्माण गीता के आदर्शों को अपनाकर ही संभव है।
काशी को धर्म संसद की आवश्यकता : राम कृष्ण गोस्वामी
संगोष्ठी के मुख्य अतिथि एवं भारतीय चरित्र निर्माण संस्थान, जयपुर के अध्यक्ष राम कृष्ण गोस्वामी ने कहा कि वर्तमान समय में काशी को एक प्रभावी धर्म संसद की आवश्यकता है, जो समाज को नैतिक दिशा प्रदान कर सके। उन्होंने कहा कि यह संगोष्ठी केवल एक बौद्धिक विमर्श नहीं, बल्कि बेहतर काशी और बेहतर समाज के निर्माण का शंखनाद है। उन्होंने कहा कि दुष्ट प्रवृत्तियों का दमन और सज्जनों की रक्षा ही वास्तविक राजधर्म है।
गीता भगवान की साक्षात वाणी : अशोक पाठक
विशिष्ट अतिथि एवं सनातन एकता मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष एडवोकेट अशोक पाठक ने अपने संबोधन में कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता कोई साधारण धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि भगवान योगेश्वर श्रीकृष्ण की साक्षात वाणी है। उन्होंने कहा कि गीता मानव जीवन के लिए सर्वोच्च आचार संहिता है, जो व्यक्ति को न्याय, कर्तव्य और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।
गीता के वैज्ञानिक और व्यावहारिक पक्षों पर हुआ विमर्श
कार्यक्रम में प्रो. चंद्रशेखर पांडेय ने “बिनु हरि कृपा मिलहि नहीं संता” सूक्ति का उल्लेख करते हुए गीता के वैज्ञानिक, व्यावहारिक और आयुर्वेदिक पक्षों पर विस्तृत व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि गीता केवल आध्यात्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह मानसिक संतुलन, स्वास्थ्य, जीवन प्रबंधन और सामाजिक समरसता का भी महत्वपूर्ण मार्गदर्शक है।
बच्चों के चरित्र निर्माण में सहायक है गीता
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे स्वामी अतुलानंद रचना परिषद् के सचिव राहुल सिंह ने कहा कि गीता संपूर्ण न्यायशास्त्र का आधार है और यह बच्चों एवं युवाओं के चरित्र निर्माण में अत्यंत सहायक सिद्ध होती है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में नैतिक शिक्षा और जीवन मूल्यों के प्रसार के लिए ऐसे आयोजनों की आवश्यकता है तथा भविष्य में भी इस प्रकार के बड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
शोध छात्र ने संभाली आयोजन की जिम्मेदारी
संगोष्ठी का सफल संचालन और प्रबंधन योजना प्रमुख एवं शोध छात्र सच्चिदानंद त्रिपाठी द्वारा किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शिक्षकों, विद्यार्थियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं धर्मप्रेमी नागरिकों ने सहभागिता कर गीता के संदेशों को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।
गीता के आदर्शों से समाज को नई दिशा देने का आह्वान
संगोष्ठी के अंत में वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि आज के दौर में नैतिक मूल्यों के संरक्षण और मानव चरित्र के सुदृढ़ निर्माण के लिए श्रीमद्भगवद्गीता के संदेशों को जन-जन तक पहुंचाना आवश्यक है। उन्होंने युवाओं को गीता के अध्ययन और उसके सिद्धांतों को जीवन में उतारने का आह्वान किया।
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