“नेपाल में हिंदू राष्ट्र की वापसी की मांग एक बार फिर चर्चा में है। जानिए 2006 में नेपाल के धर्मनिरपेक्ष बनने के बाद 2008, 2015, 2023, 2024 और 2025 में कब-कब हिंदू राष्ट्र और राजशाही की वापसी को लेकर बड़े आंदोलन हुए।“
काठमांडू: नेपाल में हिंदू राष्ट्र की मांग कोई नई राजनीतिक मांग नहीं है। पिछले करीब दो दशकों में यह मुद्दा अलग-अलग समय पर नेपाल की राजनीति और सड़कों पर दिखाई देता रहा है। कभी धार्मिक संगठनों ने इसे उठाया तो कभी राजनीतिक दलों और राजशाही समर्थक समूहों ने हिंदू राष्ट्र के साथ राजशाही की बहाली की मांग भी जोड़ी।
नेपाल लंबे समय तक दुनिया का एकमात्र आधिकारिक हिंदू राष्ट्र रहा था। लेकिन 2006 के राजनीतिक परिवर्तन के बाद देश की संवैधानिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव आया। इसके बाद 2008 में राजशाही समाप्त हुई और नेपाल गणराज्य बना। 2015 के संविधान ने नेपाल को धर्मनिरपेक्ष संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित किया।
ऐसे में सवाल उठता है कि नेपाल में हिंदू राष्ट्र की मांग कब-कब बड़ा आंदोलन बनी और इसका राजनीतिक प्रभाव कितना रहा?
2006: नेपाल की राजनीति में आया बड़ा मोड़
नेपाल में 2006 का साल राजनीतिक बदलाव के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण रहा। राजशाही के खिलाफ आंदोलन और माओवादी विद्रोह के बाद सत्ता व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन शुरू हुए।
18 मई 2006 को तत्कालीन प्रतिनिधि सभा ने नेपाल को धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया। यह उस व्यवस्था से बड़ा बदलाव था जिसमें नेपाल की पहचान हिंदू राष्ट्र के तौर पर थी।
इसी बदलाव के बाद नेपाल में हिंदू राष्ट्र की पुरानी पहचान को वापस लाने की मांग धीरे-धीरे राजनीतिक बहस का हिस्सा बनने लगी।
2008: राजशाही खत्म, गणराज्य की शुरुआत
2008 में नेपाल की संविधान सभा ने देश को संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने की दिशा में निर्णायक कदम उठाया। राजशाही समाप्त कर दी गई और नेपाल गणराज्य बन गया।
यही वह दौर था जब हिंदू राष्ट्र समर्थक समूहों के लिए मुद्दा केवल धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं रहा। कई समूहों ने राजशाही की वापसी और हिंदू राष्ट्र को एक साथ जोड़कर राजनीतिक अभियान शुरू किए।
हालांकि, तत्कालीन राजनीतिक संक्रमण और नए संविधान की प्रक्रिया में धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था को ही आगे बढ़ाया गया।
2015: नए संविधान के दौरान हिंदू राष्ट्र की मांग
2015 में नेपाल नया संविधान बनाने की प्रक्रिया से गुजर रहा था। इसी दौरान राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (RPP) और अन्य हिंदू राष्ट्र समर्थक समूहों ने देश को फिर से हिंदू राष्ट्र घोषित करने की मांग उठाई।
काठमांडू सहित कई इलाकों में प्रदर्शन और राजनीतिक गतिविधियां हुईं।
हालांकि, प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच बनी सहमति के बाद सितंबर 2015 में लागू संविधान में नेपाल को धर्मनिरपेक्ष संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में बरकरार रखा गया।
इस तरह संविधान में हिंदू राष्ट्र की मांग को जगह नहीं मिली।
2023: दुर्गा प्रसाई के आंदोलन से फिर गर्माया मुद्दा
नवंबर 2023 में कारोबारी और राजशाही समर्थक नेता दुर्गा प्रसाई के नेतृत्व में काठमांडू में बड़ा आंदोलन हुआ।
इस आंदोलन में केवल सरकार विरोध ही नहीं, बल्कि राजशाही की बहाली और नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग भी प्रमुखता से सामने आई।
प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में समर्थक काठमांडू पहुंचे। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव की स्थिति भी बनी और सुरक्षा बलों ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए बल प्रयोग किया।
इस आंदोलन ने हिंदू राष्ट्र और राजशाही के मुद्दे को नेपाल की राष्ट्रीय राजनीति में फिर से प्रमुखता दे दी।
2024: RPP ने सड़क पर उतारे समर्थक
2024 में राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी ने राजशाही और हिंदू राष्ट्र की मांग को लेकर काठमांडू समेत कई स्थानों पर प्रदर्शन किए।
फरवरी और अप्रैल के दौरान पार्टी की ओर से आयोजित गतिविधियों में नेपाल की मौजूदा गणतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था पर सवाल उठाए गए।
RPP का राजनीतिक एजेंडा लंबे समय से संवैधानिक राजशाही और हिंदू राष्ट्र की बहाली से जुड़ा रहा है। यही वजह है कि पार्टी के प्रदर्शनों में दोनों मुद्दे अक्सर एक साथ दिखाई देते हैं।
मार्च 2025: राजशाही की मांग ने लिया हिंसक रूप
मार्च 2025 में नेपाल में राजशाही समर्थक आंदोलन ने एक बार फिर बड़ा रूप लिया। पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह की सार्वजनिक गतिविधियों और उनके समर्थन में आयोजित कार्यक्रमों के बाद काठमांडू में राजशाही समर्थक समूहों की सक्रियता बढ़ी।
संयुक्त जन आंदोलन समिति के नेतृत्व में हुए प्रदर्शन में राजशाही की बहाली और हिंदू राष्ट्र की मांग उठाई गई।
प्रदर्शन के दौरान हिंसा और झड़प की स्थिति पैदा हुई। इस घटना में दो लोगों की मौत की रिपोर्ट सामने आई। इसके बाद नेपाल में राजशाही की वापसी और हिंदू राष्ट्र का मुद्दा राष्ट्रीय राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया।
कौन-कौन से संगठन उठा रहे हैं हिंदू राष्ट्र की मांग?
नेपाल में हिंदू राष्ट्र की मांग को अलग-अलग समय पर कई समूहों और राजनीतिक ताकतों का समर्थन मिला है।
इनमें प्रमुख रूप से राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (RPP), राजशाही समर्थक समूह और दुर्गा प्रसाई से जुड़े आंदोलनकारी शामिल रहे हैं।
इन समूहों के बीच मांगों में अंतर हो सकता है, लेकिन हिंदू राष्ट्र की बहाली और कई मामलों में राजशाही की वापसी साझा राजनीतिक मुद्दे रहे हैं।
क्या हिंदू राष्ट्र की मांग सिर्फ धार्मिक मुद्दा है?
नेपाल की राजनीति में यह मुद्दा केवल धर्म तक सीमित नहीं है। इसके साथ देश की पुरानी राजशाही, राष्ट्रीय पहचान, सांस्कृतिक विरासत और मौजूदा गणतांत्रिक व्यवस्था को लेकर बहस भी जुड़ी हुई है।
हिंदू राष्ट्र समर्थकों का तर्क है कि नेपाल की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान हिंदू परंपरा से गहराई से जुड़ी रही है।
वहीं धर्मनिरपेक्ष गणराज्य के समर्थक इसे नेपाल के बहुलतावादी समाज और मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था से जोड़कर देखते हैं।
2006 से 2025 तक ऐसे समझें पूरी टाइमलाइन
| वर्ष | प्रमुख घटनाक्रम |
|---|---|
| 2006 | प्रतिनिधि सभा ने नेपाल को धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया |
| 2008 | राजशाही समाप्त हुई और नेपाल गणराज्य बना |
| 2015 | नए संविधान में नेपाल धर्मनिरपेक्ष संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य बना रहा |
| 2023 | दुर्गा प्रसाई के नेतृत्व में राजशाही और हिंदू राष्ट्र की मांग वाला बड़ा आंदोलन |
| 2024 | RPP के नेतृत्व में हिंदू राष्ट्र और राजशाही समर्थक प्रदर्शन |
| 2025 | काठमांडू में राजशाही समर्थक आंदोलन ने बड़ा रूप लिया; हिंसा में मौतें हुईं |
अब आगे क्या?
नेपाल में हिंदू राष्ट्र की मांग आज भी एक राजनीतिक बहस का हिस्सा है, लेकिन इसे संवैधानिक रूप देने के लिए देश की मौजूदा व्यवस्था में बड़े बदलाव की आवश्यकता होगी।
फिलहाल नेपाल एक धर्मनिरपेक्ष संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य है। इसलिए हिंदू राष्ट्र की वापसी केवल सड़क पर होने वाले आंदोलन से नहीं, बल्कि संवैधानिक और राजनीतिक प्रक्रिया से ही संभव होगी।
2006 में धर्मनिरपेक्षता की ओर बढ़ने के बाद 2008 में राजशाही समाप्त हुई और 2015 में नया संविधान लागू हुआ। इसके बावजूद 2023, 2024 और 2025 में हिंदू राष्ट्र व राजशाही की मांग फिर बड़े आंदोलनों के रूप में सामने आई।
यही वजह है कि नेपाल में हिंदू राष्ट्र बनाम धर्मनिरपेक्ष गणराज्य की बहस आने वाले वर्षों में भी राजनीति का महत्वपूर्ण मुद्दा बनी रह सकती है।







