“पहलगाम आतंकी हमले की NIA जांच में बड़ा खुलासा हुआ है। जांच एजेंसियों के अनुसार हमले की साजिश चार साल पहले पाकिस्तान में रची गई थी। आतंकियों के पास मिले मोबाइल फोन पाकिस्तान से आयात किए गए थे और वर्षों तक निष्क्रिय रखे गए थे।“
श्रीनगर/नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर के चर्चित Pahalgam Terror Attack मामले की जांच में नए और चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) और जम्मू-कश्मीर पुलिस की जांच में संकेत मिले हैं कि यह हमला अचानक नहीं हुआ था, बल्कि इसकी तैयारी कई वर्ष पहले शुरू कर दी गई थी। जांच एजेंसियों को मिले तकनीकी साक्ष्यों से हमले में इस्तेमाल उपकरणों और उनके स्रोतों को लेकर महत्वपूर्ण जानकारियां मिली हैं।
आतंकियों के मोबाइल फोन से खुली जांच की नई दिशा
जांच के दौरान सुरक्षा बलों ने श्रीनगर के निकट दाचीगाम क्षेत्र में चलाए गए ऑपरेशन में तीन आतंकियों को मार गिराया था। मुठभेड़ के बाद बरामद दो मोबाइल फोन जांच का सबसे अहम आधार बने हैं।
सूत्रों के अनुसार, आतंकियों के पास मिले दोनों स्मार्टफोन पाकिस्तान में आयात की गई खेपों का हिस्सा थे। इनमें एक फोन वर्ष 2021 और दूसरा वर्ष 2023 में पाकिस्तान पहुंचा था। जांच एजेंसियों का दावा है कि दोनों फोन लंबे समय तक निष्क्रिय रहे और हमले से ठीक पहले सक्रिय किए गए।

IMEI जांच से सामने आई सप्लाई चेन
जांचकर्ताओं ने मोबाइल फोन के IMEI नंबरों के जरिए उनकी सप्लाई हिस्ट्री खंगाली। तकनीकी जांच में पता चला कि एक फोन वर्ष 2021 में पाकिस्तान पहुंची एक बड़ी आयातित खेप का हिस्सा था। वहीं दूसरा फोन 2023 में आयात किया गया था।
जांच एजेंसियों का मानना है कि दोनों उपकरणों का वर्षों तक निष्क्रिय रहना और बाद में एक ही आतंकी मॉड्यूल तक पहुंचना महज संयोग नहीं हो सकता। इसी आधार पर अब पूरे नेटवर्क की गहन जांच की जा रही है।
फंडिंग और लॉजिस्टिक्स की भी पड़ताल
जांच में कुछ वित्तीय दस्तावेज भी सामने आए हैं, जिनमें पाकिस्तान की एक बैंकिंग संस्था का नाम दर्ज बताया जा रहा है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में आयात प्रक्रिया के दौरान बैंकों की भूमिका सामान्य होती है और केवल दस्तावेजों में नाम होना किसी आपराधिक गतिविधि का स्वतः प्रमाण नहीं माना जा सकता।
फिर भी जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि कहीं आयात, लॉजिस्टिक्स और आतंकी नेटवर्क के बीच कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध तो नहीं था।
चार साल तक बंद रहे फोन, फिर अचानक हुए सक्रिय
जांच में सामने आया कि दोनों मोबाइल फोन कई वर्षों तक उपयोग में नहीं लाए गए। न उनमें सिम कार्ड डाले गए, न कॉल रिकॉर्ड मिले और न ही इंटरनेट गतिविधि के कोई संकेत प्राप्त हुए।
अधिकारियों का मानना है कि उपकरणों को किसी विशेष उद्देश्य के लिए सुरक्षित रखकर बाद में आतंकियों तक पहुंचाया गया हो सकता है। यही वजह है कि जांच एजेंसियां अब उन लोगों और संगठनों की पहचान करने का प्रयास कर रही हैं जिन्होंने इन उपकरणों की आपूर्ति और संरक्षण में भूमिका निभाई।
लॉन्ग-रेंज कम्युनिकेशन तकनीक के इस्तेमाल की आशंका
जांच में यह भी सामने आया है कि आतंकियों ने पारंपरिक मोबाइल नेटवर्क या इंटरनेट आधारित संचार के बजाय लंबी दूरी की रेडियो संचार तकनीक का इस्तेमाल किया हो सकता है। इस वजह से मोबाइल फोन में कॉल रिकॉर्ड, मैसेज या सोशल मीडिया गतिविधि नहीं मिली।
सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि ऐसी तकनीक का उपयोग कर आतंकी समूह निगरानी से बचने की कोशिश करते हैं, जिससे उनके नेटवर्क का पता लगाना और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
पाकिस्तान कनेक्शन की जांच जारी
जांच एजेंसियां अब उन सभी कड़ियों को जोड़ने में लगी हैं, जिनसे यह स्पष्ट हो सके कि उपकरणों की खरीद, भंडारण, आपूर्ति और इस्तेमाल के पीछे कौन-कौन लोग या संगठन शामिल थे। अधिकारियों का मानना है कि तकनीकी साक्ष्य इस हमले की साजिश के पीछे मौजूद बड़े नेटवर्क का खुलासा कर सकते हैं।
26 लोगों की गई थी जान
वर्ष 2025 में हुए इस आतंकी हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी, जिनमें बड़ी संख्या में पर्यटक शामिल थे। हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव काफी बढ़ गया था। अब NIA की जांच में सामने आ रहे नए तथ्यों ने मामले को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
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