“लखनऊ के पिपरा घाट श्मशान घाट की बदहाल स्थिति पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने सख्त रुख अपनाया। कोर्ट ने कहा कि सम्मानजनक अंतिम संस्कार व्यक्ति का मौलिक अधिकार है और प्रशासन को तत्काल मरम्मत, बाउंड्री वॉल, पेयजल व अन्य सुविधाएं सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।“
लखनऊ: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने कैंट क्षेत्र स्थित पिपरा घाट श्मशान की दुर्दशा पर कड़ी नाराजगी जताते हुए जिला प्रशासन और संबंधित अधिकारियों को तत्काल मरम्मत व जीर्णोद्धार के निर्देश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट कहा कि किसी व्यक्ति की गरिमा केवल जीवन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि मृत्यु के बाद भी उसे सम्मानजनक अंतिम संस्कार मिलना उसका मौलिक अधिकार है।
जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अभधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने कहा कि श्मशान घाट जैसी सार्वजनिक सुविधाओं की उपेक्षा प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाती है और यह मृतकों के सम्मान तथा उनके परिजनों की भावनाओं से भी जुड़ा गंभीर विषय है।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि पिपरा घाट श्मशान में पीने के पानी, शौचालय और बाउंड्री वॉल जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। बाउंड्री वॉल क्षतिग्रस्त होने के कारण बंदर, कुत्ते और गाय जैसे आवारा पशु परिसर में प्रवेश कर जाते हैं, जिससे स्वच्छता और अंतिम संस्कार की गरिमा प्रभावित होती है।
खंडपीठ ने अधिकारियों को तत्काल स्थल निरीक्षण कर आवश्यक मरम्मत और सुधार कार्य शुरू करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि अंतिम संस्कार की प्रक्रिया ऐसी परिस्थितियों में संपन्न होनी चाहिए, जहां मृतक को पूरा सम्मान और परिजनों को आवश्यक सुविधाएं मिल सकें।
सुनवाई के दौरान छावनी बोर्ड की ओर से बताया गया कि आधुनिक श्मशान घाट के निर्माण के प्रस्ताव को मंजूरी मिल चुकी है। इस पर हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि परियोजना के लिए जल्द से जल्द टेंडर जारी किया जाए और संभव हो तो चार सप्ताह के भीतर प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाए। साथ ही मौजूदा श्मशान घाट में तत्काल पेयजल सुविधा उपलब्ध कराने का भी आदेश दिया गया।
अदालत ने अपने आदेश में दोहराया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मानव गरिमा का अधिकार मृत्यु के बाद भी बना रहता है और राज्य का दायित्व है कि प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानजनक अंतिम संस्कार की व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए।
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