“डॉ राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान में “Planetary Health in Nephrology” विषय पर (CME) कंटीन्यूइंग मेडिकल एजुकेशन आयोजित, जिसमें जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण को किडनी रोगों का बड़ा कारण बताया गया।“
लखनऊ। दुनिया भर में हर 10 में से 1 व्यक्ति क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) से प्रभावित है, और अब जलवायु परिवर्तन व पर्यावरणीय क्षरण को इसके उभरते कारणों के रूप में देखा जा रहा है। इसी मुद्दे पर लखनऊ स्थित लोहिया संस्थान के नेफ्रोलॉजी विभाग ने “प्लैनेटरी हेल्थ इन नेफ्रोलॉजी” विषय पर एक महत्वपूर्ण सीएमई (CME) का आयोजन किया।

पर्यावरण और स्वास्थ्य का गहरा संबंध
कार्यक्रम का उद्घाटन संस्थान के निदेशक प्रो. सी एम सिंह ने किया। उन्होंने पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार और टिकाऊ स्वास्थ्य सेवाओं को अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। विशेषज्ञों ने बताया कि असुरक्षित पानी, बढ़ता तापमान, वायु प्रदूषण और विषैले तत्व अब किडनी रोगों के प्रमुख कारण बनते जा रहे हैं।

हीट स्ट्रेस और प्रदूषण का असर
कार्यक्रम में बताया गया कि खासकर उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में हीट स्ट्रेस नेफ्रोपैथी तेजी से बढ़ रही है। आउटडोर काम करने वाले श्रमिकों में यह खतरा अधिक देखा जा रहा है। साथ ही भारी धातुओं और कीटनाशकों के प्रभाव को भी किडनी रोगों से जोड़ा गया।

जल संरक्षण और डायलिसिस पर चर्चा
डॉ विनय राठौर और डॉ प्रीतपाल सिंह ने पानी की गुणवत्ता और हीमोडायलिसिस जैसी प्रक्रियाओं में जल संरक्षण की अहमियत पर प्रकाश डाला।
हीट एक्शन प्लान और रिसर्च इनपुट
डॉ महावीर गोलेच्छा ने भारत के हीट एक्शन प्लान के अनुभव साझा किए और उत्तर भारत में बढ़ते हीट-सम्बंधित किडनी रोगों पर चिंता जताई।
वहीं डॉ विकास श्रीवास्तव ने पर्यावरणीय नेफ्रोटॉक्सिन्स और उनके क्लिनिकल प्रभावों पर विस्तार से जानकारी दी।

डिजिटल हेल्थ और पोषण पर फोकस
डिजिटल हेल्थ सत्र में डॉ नम्रता राव ने तकनीक आधारित स्वास्थ्य सेवाओं के बेहतर उपयोग पर चर्चा की। पोषण सत्र में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड और अधिक नमक सेवन के किडनी पर दुष्प्रभावों को रेखांकित किया गया।
समापन पैनल चर्चा के साथ
कार्यक्रम का समापन पैनल चर्चा, पोस्टर प्रतियोगिता और एलुमनाई मीट के साथ हुआ। आयोजन अध्यक्ष प्रो. अभिलाष चंद्र ने नेफ्रोलॉजी प्रैक्टिस को “प्लैनेटरी हेल्थ” के सिद्धांतों के अनुरूप ढालने पर जोर दिया।
यह कार्यक्रम साफ संकेत देता है कि आने वाले समय में किडनी रोगों से निपटने के लिए केवल इलाज ही नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ जीवनशैली भी उतनी ही जरूरी होगी।
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