
“पश्चिमी यूपी में हाई कोर्ट बेंच की मांग को लेकर मेरठ में अधिवक्ताओं और सीएम योगी आदित्यनाथ के बीच वार्ता हुई। सीएम के जवाब के बाद वकीलों ने आंदोलन तेज करने का फैसला किया।“
मेरठ: पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाई कोर्ट की बेंच स्थापित करने की करीब पांच दशक पुरानी मांग को लेकर एक बार फिर मामला गरमा गया है। केंद्रीय संघर्ष समिति के नेतृत्व में अधिवक्ताओं के प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर पश्चिमी यूपी में हाई कोर्ट बेंच स्थापित करने की मांग रखी। अधिवक्ताओं के मुताबिक, मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि हाई कोर्ट बेंच का गठन उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता और यह सुप्रीम कोर्ट से संबंधित मामला है।
मुख्यमंत्री के इस जवाब के बाद अधिवक्ताओं में नाराजगी देखी गई। केंद्रीय संघर्ष समिति ने आंदोलन को आगे बढ़ाने की घोषणा की है।
मुख्यमंत्री से नौ सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने की मुलाकात
सम्मेलन समाप्त होने के बाद अधिकारियों ने करीब साढ़े तीन बजे नौ अधिवक्ताओं के प्रतिनिधिमंडल की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कराई। यह वार्ता मेरठ के वेदव्यासपुरी स्थित आरएएफ अतिथिगृह में हुई।
प्रतिनिधिमंडल में केंद्रीय संघर्ष समिति के चेयरमैन अनुज शर्मा, संयोजक परवेज आलम, मेरठ जिला बार अध्यक्ष रविंद्र सिंह और महामंत्री प्रशांत गुप्ता समेत अन्य अधिवक्ता शामिल रहे। प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री को हाई कोर्ट बेंच की मांग से संबंधित मांगपत्र सौंपा।
22 जिलों और सात करोड़ आबादी का दिया हवाला
अधिवक्ताओं ने मुख्यमंत्री के सामने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाई कोर्ट बेंच की आवश्यकता को लेकर अपना पक्ष रखा। केंद्रीय संघर्ष समिति के पदाधिकारियों के मुताबिक, पश्चिमी यूपी के 22 जिलों में करीब दो लाख अधिवक्ता और लगभग सात करोड़ की आबादी है।
अधिवक्ताओं ने कहा कि क्षेत्रफल, लंबित मुकदमों और बड़ी आबादी को देखते हुए पश्चिमी यूपी में हाई कोर्ट बेंच की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही है। उनका कहना है कि यह मांग करीब 50 वर्षों से उठाई जा रही है।
प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री के सामने यह भी कहा कि यदि सरकार इस मांग को अनुचित मानती है तो उसे स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर देना चाहिए।
‘बेंच देना हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं’
केंद्रीय संघर्ष समिति के चेयरमैन अनुज शर्मा और संयोजक परवेज आलम के अनुसार, मुख्यमंत्री ने बातचीत के दौरान हाई कोर्ट बेंच स्थापित करने की मांग को स्वीकार नहीं किया। अधिवक्ताओं के मुताबिक, मुख्यमंत्री ने कहा कि बेंच देना उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट से संबंधित विषय है।
इसके बाद अधिवक्ताओं ने मुख्यमंत्री के सामने एक वैकल्पिक रास्ता भी रखा। उन्होंने जम्मू-कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र की बेंच का उदाहरण देते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश विधानसभा से पश्चिमी यूपी में हाई कोर्ट बेंच के पक्ष में प्रस्ताव पारित कराकर केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट को भेजा जा सकता है।
अधिवक्ताओं का कहना है कि उन्होंने इस संबंध में नियमों और प्रक्रिया की जानकारी भी मुख्यमंत्री को दी। इस पर मुख्यमंत्री ने उनसे संबंधित नियम लिखकर देने को कहा और इसके बाद बैठक समाप्त हो गई।
वार्ता के बाद आंदोलन तेज करने का फैसला
मुख्यमंत्री से मुलाकात के बाद अधिवक्ताओं ने बैठक कर आगे की रणनीति पर चर्चा की। केंद्रीय संघर्ष समिति के पदाधिकारियों के अनुसार, मुख्यमंत्री के जवाब के बाद अब आंदोलन को और तेज करने का निर्णय लिया गया है।
समिति ने मंगलवार को सहारनपुर में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के कार्यक्रम के दौरान काले झंडे दिखाकर विरोध जताने की घोषणा की है। इसके साथ ही मेरठ में दोनों बार एसोसिएशन की संयुक्त आमसभा बुलाकर आंदोलन की अगली रणनीति तय करने की बात कही गई है।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि काले झंडे दिखाने का निर्णय अधिवक्ताओं की संघर्ष समिति द्वारा घोषित विरोध कार्यक्रम है।
जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी उठाए सवाल
अधिवक्ताओं ने मुख्यमंत्री के साथ हुई बैठक में मौजूद जनप्रतिनिधियों के रुख पर भी सवाल उठाया। संघर्ष समिति के पदाधिकारियों का दावा है कि वार्ता के दौरान सांसद अरुण गोविल, राज्यसभा सदस्य लक्ष्मीकांत बाजपेयी, प्रभारी जिला मंत्री असीम अरुण, राज्यमंत्री सोमेंद्र तोमर और कैंट विधायक अमित अग्रवाल भी मौजूद थे।
अधिवक्ताओं का कहना है कि इन जनप्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री के सामने हाई कोर्ट बेंच की मांग को लेकर कोई बात नहीं रखी। इसी को लेकर संघर्ष समिति के पदाधिकारियों ने नाराजगी जताई।
पांच दशक से चली आ रही मांग
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाई कोर्ट की अलग बेंच स्थापित करने की मांग नई नहीं है। मेरठ और पश्चिमी यूपी के अधिवक्ता लंबे समय से इस मुद्दे को लेकर आंदोलन करते रहे हैं। उनका तर्क रहा है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट तक पहुंचने में पश्चिमी यूपी के लोगों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है और क्षेत्र में बड़ी संख्या में मुकदमे लंबित हैं।
अब मुख्यमंत्री के साथ हुई वार्ता के बाद इस मुद्दे पर अधिवक्ताओं का आंदोलन फिर तेज होने के संकेत हैं। आगे संघर्ष समिति किस तरह का कार्यक्रम घोषित करती है और सरकार या केंद्र की ओर से इस मांग पर क्या रुख सामने आता है, इस पर नजर रहेगी।
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