लखनऊ SGPGI में चमत्कार, प्रीटर्म बच्चे का ट्रांसकैथेटर तकनीक से इलाज

ट्रांसकैथेटर डिवाइस क्लोजर तकनीक से बिना ओपन सर्जरी बचाई नाजुक बच्चे की जान

लखनऊ के SGPGIMS में 34 सप्ताह में जन्मे गंभीर प्रीटर्म नवजात शिशु के हृदय दोष (PDA) का ट्रांसकैथेटर डिवाइस क्लोजर से सफल इलाज किया गया। बिना ओपन सर्जरी बच्चे को नई जिंदगी मिली।

लखनऊ। संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (SGPGIMS) ने नवजात एवं हृदय चिकित्सा के क्षेत्र में बड़ी सफलता हासिल की है। संस्थान के चिकित्सकों ने 34 सप्ताह में जन्मे अत्यंत नाजुक और गंभीर रूप से बीमार प्रीटर्म शिशु के हृदय दोष का सफल उपचार उन्नत ट्रांसकैथेटर डिवाइस क्लोजर तकनीक से किया।

उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था से हुआ जन्म

अस्पताल प्रशासन के अनुसार यह शिशु एक अत्यंत संवेदनशील गर्भावस्था से जन्मा था। शिशु की मां को पहले 13 बार गर्भ हानि हो चुकी थी, जिससे यह गर्भावस्था बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही थी। गर्भावस्था की निगरानी डॉ. संगीता और प्रो. मंदाकिनी प्रधान द्वारा की गई।

जांच के दौरान शिशु में गंभीर फीटल ग्रोथ रेस्ट्रिक्शन पाया गया, जो प्लेसेंटा के सही ढंग से काम न करने के कारण होता है।

जन्म के बाद सांस लेने में दिक्कत

जन्म के तुरंत बाद शिशु को गंभीर श्वसन संकट हुआ, जिसके बाद उसे नवजात गहन चिकित्सा इकाई (NICU) में भर्ती किया गया। चिकित्सकों ने सर्फैक्टेंट थेरेपी और वेंटिलेटर सपोर्ट दिया।

इसके बाद शिशु में पेटेंट डक्टस आर्टेरियोसस (PDA) नामक हृदय दोष पाया गया। यह ऐसी स्थिति है जिसमें जन्म के बाद बंद हो जाने वाली रक्त वाहिका खुली रह जाती है, जिससे फेफड़ों और हृदय पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।

दवाओं से नहीं मिला लाभ

प्रारंभिक उपचार के तौर पर पैरासिटामोल और आइबुप्रोफेन जैसी दवाएं दी गईं, लेकिन अपेक्षित लाभ नहीं मिला। शिशु लंबे समय तक श्वसन सहायता पर निर्भर रहा।

बिना ओपन सर्जरी किया गया इलाज

लगभग 45वें दिन शिशु की स्थिति स्थिर होने पर डॉक्टरों ने ट्रांसकैथेटर PDA डिवाइस क्लोजर प्रक्रिया की। इस तकनीक में कैथेटर के जरिए एक छोटा उपकरण शरीर के भीतर पहुंचाकर असामान्य रक्त वाहिका को बंद किया जाता है। इसमें ओपन सर्जरी की आवश्यकता नहीं होती।

यह प्रक्रिया इतने छोटे और नाजुक प्रीटर्म शिशु में तकनीकी रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण मानी जाती है।

तेजी से हुआ सुधार

प्रक्रिया के बाद शिशु की हालत लगातार बेहतर होती गई। धीरे-धीरे वेंटिलेटर सपोर्ट हटाया गया, स्वास्थ्य संकेत सामान्य हुए और बच्चे ने दूध पीना तथा वजन बढ़ाना शुरू किया।

अंततः जीवन के 76वें दिन शिशु को स्वस्थ अवस्था में अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।

विशेषज्ञ टीम ने निभाई अहम भूमिका

हृदय रोग विभाग की टीम का नेतृत्व डॉ. अंकित साहू और प्रो. आदित्य कपूर ने किया। वहीं नवजात विभाग की टीम डॉ. कीर्ति एम. नरांजे के निर्देशन में कार्यरत रही।

निदेशक ने दी बधाई

संस्थान के निदेशक प्रो. आर. के. धीमन ने पूरी टीम को बधाई देते हुए कहा कि ऐसी जटिल और सफल चिकित्सा उपलब्धियां संस्थान को देश में उन्नत नवजात एवं हृदय देखभाल के क्षेत्र में अग्रणी बनाती हैं।

चिकित्सा क्षेत्र के लिए मिसाल

यह उपलब्धि दर्शाती है कि आधुनिक तकनीक, विशेषज्ञता और समन्वित टीमवर्क के जरिए अत्यंत जटिल नवजात मामलों का भी सफल उपचार संभव है।

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