भारतीय न्यायपालिका में इतिहास: पहली बार 4 महिलाएं बनीं हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस

देश की न्यायिक व्यवस्था में बढ़ा महिला नेतृत्व; आंध्र प्रदेश, गुजरात, मेघालय और पटना हाईकोर्ट की कमान अब महिलाओं के हाथों में

भारत के न्यायिक इतिहास में पहली बार चार महिलाएं एक साथ हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्यरत हैं। पटना हाईकोर्ट में जस्टिस मीनाक्षी मदन राय की नियुक्ति के साथ यह ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज हुई। जानिए चारों महिला चीफ जस्टिस, उनका सफर और न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी से जुड़े अहम तथ्य।

नई दिल्ली। भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में वर्ष 2026 एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में दर्ज हो गया है। पहली बार देश में चार महिलाएं एक साथ विभिन्न उच्च न्यायालयों की मुख्य न्यायाधीश (चीफ जस्टिस) के रूप में कार्यरत हैं। पटना हाईकोर्ट में मीनाक्षी मदन राय की नियुक्ति के साथ यह ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल हुई है।

इससे पहले भी कुछ अवसरों पर चार महिलाएं एक साथ उच्च न्यायालयों के शीर्ष पदों पर रही थीं, लेकिन उनमें से एक कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश थीं। वर्ष 2026 पहली बार ऐसा अवसर लेकर आया है जब चार महिला न्यायाधीश नियमित मुख्य न्यायाधीश के रूप में जिम्मेदारी संभाल रही हैं।

कौन हैं चारों महिला मुख्य न्यायाधीश?

वर्तमान में देश के चार उच्च न्यायालयों का नेतृत्व महिला मुख्य न्यायाधीश कर रही हैं।

  • मीनाक्षी मदन राय – पटना हाईकोर्ट
  • सुनीता अग्रवाल – गुजरात हाईकोर्ट
  • रेवती मोहिते डेरे – मेघालय हाईकोर्ट
  • लिसा गिल – आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

इन नियुक्तियों को न्यायपालिका में लैंगिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

पटना हाईकोर्ट की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश

मीनाक्षी मदन राय ने 5 जून 2026 को पटना हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश के रूप में पदभार ग्रहण किया। वह इस पद तक पहुंचने वाली पटना हाईकोर्ट की पहली महिला हैं। इससे पहले वह सिक्किम हाईकोर्ट में न्यायाधीश के रूप में कार्यरत थीं।

महिला नेतृत्व की शुरुआत लीला सेठ ने की थी

भारतीय न्यायपालिका में महिला नेतृत्व की शुरुआत वर्ष 1991 में हुई थी, जब लीला सेठ को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। वह किसी भी भारतीय उच्च न्यायालय की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश बनी थीं।

उनके बाद कई महिला न्यायाधीशों ने उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट तक का सफर तय किया। इनमें सुजाता वी. मनोहर, रूमा पाल, इंदिरा बनर्जी और हिमा कोहली जैसे नाम प्रमुख हैं।

न्यायपालिका में महिलाओं की हिस्सेदारी अभी भी सीमित

हालांकि यह उपलब्धि ऐतिहासिक है, लेकिन न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी अभी भी अपेक्षाकृत कम है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार फरवरी 2026 तक देश के उच्च न्यायालयों में कुल 781 न्यायाधीशों में से 116 महिलाएं थीं। यानी महिला प्रतिनिधित्व लगभग 14.85 प्रतिशत रहा।

विशेषज्ञों का मानना है कि उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में महिलाओं की बढ़ती मौजूदगी न्यायिक निर्णयों में विविध दृष्टिकोण और अधिक समावेशी सोच को बढ़ावा देती है।

कई महिला मुख्य न्यायाधीश बनीं सुप्रीम कोर्ट जज

उच्च न्यायालयों का नेतृत्व करने वाली कई महिला न्यायाधीश बाद में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचीं। इनमें इंदिरा बनर्जी, हिमा कोहली और आर. भानुमति प्रमुख हैं।

वहीं मंजुला चेल्लूर ने केरल, बॉम्बे और कलकत्ता जैसे तीन अलग-अलग उच्च न्यायालयों की मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्य कर एक विशिष्ट रिकॉर्ड बनाया था।

क्यों महत्वपूर्ण है यह उपलब्धि?

चार महिलाओं का एक साथ उच्च न्यायालयों की मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्य करना केवल एक सांकेतिक उपलब्धि नहीं माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार इससे न्यायपालिका में विविधता, समान अवसर और महिला नेतृत्व को संस्थागत मजबूती मिलती है।

यह उपलब्धि बताती है कि भारतीय न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है, हालांकि शीर्ष न्यायिक पदों पर संतुलित प्रतिनिधित्व हासिल करने की दिशा में अभी भी लंबा सफर तय करना बाकी है।

न्यायपालिका में बदलाव का संकेत

चार महिला मुख्य न्यायाधीशों का एक साथ कार्यरत होना भारतीय न्यायिक व्यवस्था में बदलते परिदृश्य का संकेत माना जा रहा है। यह न केवल महिलाओं के बढ़ते प्रतिनिधित्व को दर्शाता है, बल्कि न्यायिक संस्थानों में लैंगिक संतुलन और समावेशिता की दिशा में हो रही प्रगति को भी रेखांकित करता है।

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