Colonel Sofiya Qureshi ने Gen Z से दर्शक नहीं रक्षक बनने का किया आह्वान, बदलती युद्धकला के

राष्ट्रीय प्रस्तावना न्यूज़ नेटवर्क
भारतीय सेना के चाणक्य डिफेंस डायलॉग में कर्नल सोफिया कुरैशी ने युवा नेतृत्व यानि एक तरह से जेन जी को संबोधित करते हुए कहा कि “राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सीमा पर तैनात सैनिकों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर युवा भारतीय की साझी प्रतिज्ञा होनी चाहिए।” उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर जैसे हालिया सैन्य अभियानों से सीख लेते हुए बताया कि आज की युद्धकला तेजी से बदल रही है— अब युद्ध केवल बंदूकों से नहीं, बल्कि ड्रोन, साइबर और इलेक्ट्रॉनिक तकनीक से लड़े जा रहे हैं।कर्नल कुरैशी ने युवाओं की भागीदारी को राष्ट्रीय सुरक्षा की रीढ़ बताते हुए कहा कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में युवा न केवल सैनिक बनकर, बल्कि प्रौद्योगिकी, अनुसंधान, नीति और कूटनीति में भी सुरक्षा को सशक्त बना सकते हैं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि विश्व भर में शांति स्थापना और संघर्ष प्रबंधन में युवाओं की भूमिका लगातार बढ़ रही है और भारत को इस प्रवृत्ति का नेतृत्व करना चाहिए।देखा जाये तो भारत की रक्षा आज केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि साइबर स्पेस, तकनीकी प्रयोगशालाओं, और युवा मनों की ऊर्जा में भी तय हो रही है। कर्नल सोफिया कुरैशी का संदेश इसी यथार्थ को उजागर करता है कि आने वाले दशक में युद्ध का मैदान डिजिटल होगा और सैनिक की पहचान उसकी सोच, नवाचार और जागरूकता से तय होगी। कर्नल कुरैशी की बातों में दो स्पष्ट संदेश हैं— पहला, कि भारत की सुरक्षा व्यवस्था को जनसामान्य के सक्रिय सहयोग की आवश्यकता है; और दूसरा, कि युवाओं की रचनात्मक शक्ति को अब केवल सामाजिक अभियानों तक सीमित न रखकर राष्ट्र की सामरिक शक्ति में रूपांतरित करना होगा। “ऑपरेशन सिंदूर” का उदाहरण उन्होंने इसीलिए दिया क्योंकि यह आधुनिक युद्धकला का प्रतीक बन चुका है। यह एक ऐसा अभियान था जहाँ सटीकता, प्रौद्योगिकी और बहुआयामी रणनीति ने निर्णायक सफलता दिलाई। यह वही सोच है जो 21वीं सदी के युद्ध को पारंपरिक सैनिक संघर्ष से बौद्धिक और तकनीकी संघर्ष में बदल रही है। आज भारत के पास लगभग 65% आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है, यह वही जनसंख्या है जो आने वाले वर्षों में न केवल देश की अर्थव्यवस्था बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे को भी आकार देगी। इस संदर्भ में कर्नल कुरैशी का यह कथन कि “हर युवा देश की पहली रक्षा पंक्ति है” केवल एक प्रेरक वाक्य नहीं, बल्कि एक नीति-सूत्र है। देखा जाये तो सुरक्षा अब ‘बंदूक की शक्ति’ से अधिक ‘बुद्धि की शक्ति’ पर निर्भर है। साइबर युद्ध, ड्रोन मिशन, डेटा-सुरक्षा, और सूचना अभियानों में अब वही देश आगे रहेगा, जिसके युवा तकनीकी रूप से सक्षम, राष्ट्रभक्त और रणनीतिक दृष्टि से सजग हों। यही कारण है कि कर्नल कुरैशी का यह संदेश राष्ट्रीय सुरक्षा की परिभाषा को लोकतांत्रिक दायरे में विस्तारित करता है। इसमें सैनिक के साथ-साथ नवप्रवर्तक, इंजीनियर, हैकर, वैज्ञानिक और नीति-निर्माता— सभी को समान भूमिका दी गई है। यदि भारत अपने युवाओं की ऊर्जा को सही दिशा में साध ले, तो यह शक्ति केवल रोजगार या विकास का साधन नहीं, बल्कि एक सामरिक संपत्ति बन जाएगी। कर्नल कुरैशी की यह पुकार कि युवा केवल “दर्शक” न बनें, बल्कि “रक्षक” बनें, आज के समय की सबसे सशक्त राष्ट्रीय प्रेरणा है। कर्नल सोफिया कुरैशी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा का भविष्य हथियारों से नहीं, विचारों से लिखा जाएगा। भारत के युवाओं को अब यह तय करना है कि वे उस भविष्य के निर्माता बनेंगे या दर्शक।

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