“पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस में असंतोष बढ़ गया है। 58 विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष को प्रस्ताव सौंपकर खुद को असली तृणमूल बताया और ऋतब्रत बंद्योपाध्याय को विपक्ष का नेता बनाने की मांग की।“
कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद अंदरूनी असंतोष खुलकर सामने आता दिखाई दे रहा है। बुधवार को तृणमूल कांग्रेस के 60 विधायक विधानसभा पहुंचे और विधानसभा अध्यक्ष को एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव सौंपा। इस घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है।
सूत्रों के अनुसार, प्रस्ताव पर 58 विधायकों के हस्ताक्षर हैं और इसमें खुद को “वास्तविक तृणमूल कांग्रेस” का प्रतिनिधि बताया गया है। साथ ही पार्टी से निष्कासित विधायक ऋतब्रत बंद्योपाध्याय को विधानसभा में विरोधी दल का नेता (नेता प्रतिपक्ष) नियुक्त करने का प्रस्ताव भी रखा गया है।
चुनावी हार के बाद बढ़ा असंतोष
विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर नेतृत्व और संगठन को लेकर असंतोष की चर्चाएं लगातार सामने आ रही थीं। बुधवार को बड़ी संख्या में विधायकों का विधानसभा पहुंचकर अलग प्रस्ताव सौंपना इसी असंतोष का सार्वजनिक संकेत माना जा रहा है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पार्टी के कई विधायक वर्तमान नेतृत्व की कार्यशैली और चुनावी रणनीति को लेकर नाराज हैं। हालांकि इस संबंध में अभी तक पार्टी नेतृत्व की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
निष्कासित नेताओं के संपर्क में बताए जा रहे विधायक
बताया जा रहा है कि प्रस्ताव सौंपने वाले विधायक पार्टी से निष्कासित किए जा चुके नेताओं ऋतब्रत बंद्योपाध्याय और संदीपन साहा के संपर्क में हैं।
दोनों नेताओं ने ही विधानसभा अध्यक्ष को 58 विधायकों के हस्ताक्षर वाला प्रस्ताव सौंपा। इस कदम को तृणमूल कांग्रेस के भीतर संभावित शक्ति प्रदर्शन और नए राजनीतिक समीकरणों के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
नेता प्रतिपक्ष पद को लेकर नया दावा
प्रस्ताव में विधायकों ने ऋतब्रत बंद्योपाध्याय को विरोधी दल का नेता बनाए जाने की मांग की है। यदि यह दावा राजनीतिक और संवैधानिक रूप से आगे बढ़ता है, तो विधानसभा के भीतर विपक्ष की भूमिका और नेतृत्व को लेकर नई बहस शुरू हो सकती है।
हालांकि इस संबंध में अंतिम निर्णय विधानसभा अध्यक्ष के स्तर पर ही लिया जाएगा। अध्यक्ष प्रस्ताव की वैधता, विधायकों की स्थिति और विधानसभा नियमों के आधार पर आगे की कार्रवाई कर सकते हैं।
तृणमूल के सामने बढ़ी चुनौती
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी हार के बाद पार्टी के भीतर इस प्रकार की गतिविधियां नेतृत्व के लिए चुनौतीपूर्ण स्थिति पैदा कर सकती हैं। यदि असंतोष और बढ़ता है तो इसका असर संगठनात्मक ढांचे और विपक्ष की राजनीति दोनों पर पड़ सकता है।
फिलहाल सभी की नजरें विधानसभा अध्यक्ष के रुख और तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह घटनाक्रम केवल असंतुष्ट विधायकों का दबाव बनाने का प्रयास है या फिर पार्टी के भीतर किसी बड़े राजनीतिक पुनर्गठन की शुरुआत।
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