‘आठ हजार में जोड़ी हड्डी, 10 हजार और नहीं दिए तो दोबारा तोड़ी’, जिला अस्पताल में डॉक्टर पर गंभीर आरोप

दिव्यांग किशोरी की मां ने डीएम से लगाई गुहार, डॉक्टर बोले- आरोप निराधार; जांच के बाद होगा सच का खुलासा

मुजफ्फरनगर जिला अस्पताल में आर्थोपेडिक सर्जन पर 13 वर्षीय दिव्यांग किशोरी के इलाज के नाम पर रुपये लेने और अतिरिक्त पैसे न मिलने पर हड्डी तोड़ने का आरोप लगा है। पीड़िता की मां ने डीएम से शिकायत की है। जानिए पूरा मामला, डॉक्टर का पक्ष और स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई।

मुजफ्फरनगर। स्वामी कल्याण देव जिला चिकित्सालय एक बार फिर विवादों में घिर गया है। इस बार एक महिला ने अस्पताल के आर्थोपेडिक सर्जन पर गंभीर आरोप लगाते हुए जिलाधिकारी से शिकायत की है। पीड़िता का आरोप है कि उसकी 13 वर्षीय दिव्यांग बेटी के पैर के ऑपरेशन के नाम पर डॉक्टर ने रुपये लिए और बाद में अतिरिक्त रकम न देने पर इलाज के दौरान उसकी हड्डी तोड़ दी।

गांव खांजापुर निवासी रेशमा ने जिलाधिकारी उमेश मिश्रा को दिए गए प्रार्थना पत्र में आरोप लगाया है कि उसकी बेटी के पैर में समस्या थी, जिसके उपचार के लिए वह जिला अस्पताल पहुंची थी। यहां आर्थोपेडिक विभाग के चिकित्सक ने ऑपरेशन की सलाह दी और इसके लिए रुपये की मांग की।

ऑपरेशन के नाम पर लिए गए 8 हजार रुपये

पीड़िता के अनुसार डॉक्टर ने शुरुआत में ऑपरेशन के लिए 25 हजार रुपये की मांग की थी। बाद में आठ हजार रुपये लेकर ऑपरेशन किया गया। महिला का कहना है कि ऑपरेशन के बाद भी बेटी के पैर की परेशानी दूर नहीं हुई, जिसके चलते वह दोबारा अस्पताल पहुंची।

रेशमा का आरोप है कि दूसरी बार अस्पताल पहुंचने पर चिकित्सक ने 10 हजार रुपये और मांगे। जब उसने रुपये देने में असमर्थता जताई तो इलाज के दौरान उसकी बेटी का पैर जोर से मोड़ दिया गया, जिससे हड्डी टूट गई। महिला ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

डीएम से न्याय की गुहार

कांशीराम कॉलोनी निवासी महिला अपनी शिकायत लेकर सीधे जिलाधिकारी कार्यालय पहुंची और न्याय की मांग की। उसने आरोप लगाया कि आर्थिक तंगी के बावजूद उसने बेटी के इलाज के लिए पैसे जुटाए, लेकिन इसके बावजूद उसे उचित उपचार नहीं मिला।

अस्पताल प्रशासन ने कराई जांच

मामले के सामने आने के बाद जिला अस्पताल प्रशासन हरकत में आ गया। अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक (सीएमएस) डॉ. संजय वर्मा ने बताया कि शिकायत की प्राथमिक जांच कराई गई है।

उनके अनुसार किशोरी का ऑपरेशन करीब दो माह पहले किया गया था। ऑपरेशन के दौरान बाहर से विशेष रॉड मंगाकर पैर में लगाई गई थी, जिसकी कीमत लगभग आठ हजार रुपये थी। यही राशि परिजनों द्वारा जमा की गई थी।

डॉ. वर्मा ने बताया कि ऑपरेशन के बाद परिजनों ने चिकित्सकीय सलाह के अनुसार बच्ची को नियमित रूप से चलाने-फिराने का प्रयास नहीं किया, जिससे उसका घुटना जाम हो गया। जांच के दौरान जब घुटने को सामान्य रूप से मोड़ने और चलाने का प्रयास किया गया तो बच्ची दर्द से चिल्लाने लगी। उन्होंने कहा कि मामले की विस्तृत जांच की जा रही है।

डॉक्टर ने आरोपों को बताया झूठा

आर्थोपेडिक सर्जन डॉ. पीके चतुर्वेदी ने अपने ऊपर लगाए गए सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि किशोरी का ऑपरेशन पूरी तरह चिकित्सकीय मानकों के अनुसार किया गया था और उपचार में कोई लापरवाही नहीं बरती गई।

डॉ. चतुर्वेदी के अनुसार मरीज के परिजनों ने ऑपरेशन के बाद आवश्यक सावधानियों का पालन नहीं किया, जिससे समस्या उत्पन्न हुई। उन्होंने कहा कि रुपये लेने और जानबूझकर हड्डी तोड़ने के आरोप पूरी तरह निराधार हैं तथा उन्हें बेवजह बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने अपना पक्ष संबंधित अधिकारियों के समक्ष रख दिया है।

जांच रिपोर्ट पर टिकी निगाहें

गंभीर आरोपों और डॉक्टर के इनकार के बीच अब सभी की निगाहें प्रशासनिक जांच पर टिकी हैं। जांच रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि मामले में किस पक्ष का दावा सही है और क्या किसी प्रकार की चिकित्सकीय लापरवाही या अनियमितता हुई है।

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