आरएमएलआईएमएस में पहली बार IPC प्रक्रिया सफल, फेफड़ों के कैंसर मरीजों को मिली बड़ी राहत

लखनऊ में उन्नत श्वसन चिकित्सा की नई उपलब्धि, कैंसर मरीजों के उपचार में मिला नया विकल्प

डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (RMLIMS) लखनऊ में पहली बार इंडवेलिंग प्लूरल कैथेटर (IPC) प्रक्रिया सफलतापूर्वक की गई। इस तकनीक से फेफड़ों के कैंसर और बार-बार प्लूरल इफ्यूजन से पीड़ित मरीजों को बड़ी राहत मिलेगी।

लखनऊ। डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (RMLIMS) लखनऊ ने फेफड़ों के कैंसर और अन्य गंभीर रोगों से जूझ रहे मरीजों के उपचार में एक नई उपलब्धि हासिल की है। संस्थान के पल्मोनरी मेडिसिन विभाग ने पहली बार इंडवेलिंग प्लूरल कैथेटर (Indwelling Pleural Catheter – IPC) प्रक्रिया को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है। यह तकनीक उन मरीजों के लिए बेहद लाभकारी मानी जा रही है जिनके फेफड़ों के आसपास बार-बार पानी जमा हो जाता है और सांस लेने में गंभीर परेशानी होती है।

संस्थान के निदेशक ने इस उपलब्धि पर पल्मोनरी मेडिसिन विभाग की पूरी टीम को बधाई देते हुए कहा कि यह सफलता प्रदेश के मरीजों को अत्याधुनिक श्वसन चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

कैंसर मरीज को मिली बड़ी राहत

पल्मोनरी मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. अजय कुमार वर्मा ने बताया कि IPC प्रक्रिया ऐसे मरीजों के लिए बेहद प्रभावी है जिनके फेफड़ों के आसपास बार-बार द्रव जमा होता है। पारंपरिक उपचार में मरीजों को हर कुछ दिनों में अस्पताल आकर द्रव निकलवाना पड़ता था, जबकि IPC तकनीक के जरिए प्लूरल कैविटी में एक विशेष कैथेटर स्थापित कर दिया जाता है, जिससे जरूरत पड़ने पर आसानी से द्रव निकाला जा सकता है।

विशेषज्ञ चिकित्सक डॉ. हेमंत कुमार अग्रवाल ने बताया कि यह प्रक्रिया एक स्टेज-4 कैंसर मरीज पर की गई, जिसे हर चार से पांच दिन में फेफड़ों के आसपास जमा पानी निकलवाना पड़ता था। मरीज जनपद गोंडा का निवासी था और बार-बार लखनऊ आना उसके लिए बेहद कठिन था।

संक्रमण का खतरा होगा कम

डॉ. हेमंत कुमार ने बताया कि बार-बार की जाने वाली प्रक्रियाओं से संक्रमण का खतरा भी बढ़ जाता है। IPC तकनीक इस जोखिम को कम करती है और मरीज को बार-बार अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इससे मरीज की जीवन गुणवत्ता (Quality of Life) में उल्लेखनीय सुधार होता है।

ऑटोप्ल्यूरोडेसिस से मिल सकती है स्थायी राहत

विशेषज्ञों के अनुसार IPC तकनीक का सबसे बड़ा लाभ ऑटोप्ल्यूरोडेसिस (Autopleurodesis) है। इस प्रक्रिया में फेफड़ों को घेरे रहने वाली दोनों झिल्लियां समय के साथ आपस में चिपक जाती हैं, जिससे द्रव बनने की प्रक्रिया स्वतः बंद हो सकती है। इससे मरीज को लंबे समय तक राहत मिलने की संभावना रहती है।

विशेषज्ञ टीम ने निभाई अहम भूमिका

इस जटिल प्रक्रिया को विभागाध्यक्ष डॉ. अजय कुमार वर्मा के नेतृत्व में विशेषज्ञ चिकित्सकों डॉ. हेमंत कुमार अग्रवाल, डॉ. मृत्युंजय सिंह, डॉ. सुलक्षणा गौतम, डॉ. पुलकित गुप्ता, डॉ. सागर जैन और डॉ. कनक वर्मा ने सफलतापूर्वक सम्पन्न किया।

ऑपरेशन थिएटर टीम में वंदना, मनीष, पिंकी, सुमन, आरती और रामेश्वर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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