‘शेर-कुत्ते’ की भाषा पर गरमाई महाराष्ट्र की सियासत, शिंदे-राउत में छिड़ी जुबानी जंग

शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों के संभावित दल-बदल की अटकलों के बीच बयानबाजी तेज, शिंदे बोले- "शेर अकेला आता है", राउत का पलटवार- "कुछ लोग कुत्ते तो होते हैं, लेकिन वफादार नहीं"

महाराष्ट्र में शिवसेना (UBT) और एकनाथ शिंदे गुट के बीच सियासी संघर्ष तेज हो गया है। ‘कुत्ते और शेर’ वाले बयान को लेकर संजय राउत और एकनाथ शिंदे आमने-सामने आ गए हैं। वहीं 6 सांसदों के संभावित दल-बदल की अटकलों ने राजनीतिक माहौल गर्मा दिया है।

मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर सियासी तापमान बढ़ गया है। शिवसेना (यूबीटी) और मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के बीच जुबानी जंग नए स्तर पर पहुंच गई है। पार्टी के छह सांसदों के संभावित दल-बदल की चर्चाओं के बीच दोनों गुटों के नेताओं ने एक-दूसरे पर तीखे राजनीतिक हमले शुरू कर दिए हैं।

ताजा विवाद उस समय सामने आया जब शिवसेना (यूबीटी) के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट साझा करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से शिंदे गुट पर निशाना साधा। राउत ने एक इन्फोग्राफिक पोस्ट किया, जिसमें लिखा था, “कुछ लोग कुत्ते तो होते हैं लेकिन वफादार नहीं होते।” इसके साथ उन्होंने “जय महाराष्ट्र” लिखकर अपना संदेश साझा किया।

शिंदे के बयान पर राउत का पलटवार

राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि राउत की यह टिप्पणी मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के हालिया बयान के जवाब में आई है। शिंदे ने अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए कहा था कि कुछ लोग लगातार उनकी आलोचना कर रहे हैं, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

उन्होंने कहा था, “कुछ कुत्ते भौंकते रहते हैं। कुत्ते झुंड में भौंकते हैं, लेकिन शेर अकेला आता है। जब शेर शिकार करता है तब भी कुत्ते भौंकते रहते हैं। जब शेर दहाड़ता है तब भी वे भौंकते रहते हैं। यही असली शिवसेना है और आज महाराष्ट्र में मजबूती के साथ खड़ी है।”

शिंदे के इस बयान को सीधे तौर पर उद्धव ठाकरे गुट पर हमला माना गया था। इसके बाद राउत की प्रतिक्रिया ने राजनीतिक टकराव को और तेज कर दिया है।

छह सांसदों की गैरहाजिरी से बढ़ी अटकलें

यह पूरा विवाद ऐसे समय सामने आया है जब शिवसेना (यूबीटी) के भीतर एक और संभावित टूट की चर्चा जोरों पर है। हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित पार्टी की महत्वपूर्ण संसदीय दल की बैठक में नौ लोकसभा सांसदों में से छह सांसद शामिल नहीं हुए थे।

इन सांसदों की अनुपस्थिति के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई कि वे मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट में शामिल हो सकते हैं। हालांकि अभी तक किसी सांसद ने सार्वजनिक रूप से दल-बदल की पुष्टि नहीं की है।

कार्रवाई की तैयारी में उद्धव गुट

संजय राउत ने इन अटकलों के बीच स्पष्ट संकेत दिया है कि पार्टी अनुशासनहीनता को लेकर सख्त रुख अपनाने जा रही है। उन्होंने बताया कि बैठक से अनुपस्थित सांसदों को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिए गए हैं और उनके खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

राउत ने कहा कि यदि लोकसभा अध्यक्ष संविधान, दल-बदल कानून और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप निर्णय लेते हैं तो संबंधित सांसदों को अयोग्य घोषित किया जा सकता है। उन्होंने दावा किया कि पार्टी अपने अधिकारों की रक्षा के लिए हर कानूनी विकल्प का उपयोग करेगी।

‘ऑपरेशन टाइगर’ की चर्चा ने बढ़ाई बेचैनी

राजनीतिक संकट को उस समय और बल मिला जब शिवसेना के विधान परिषद सदस्य चंद्रकांत रघुवंशी ने दावा किया कि शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसद मुख्यमंत्री शिंदे के नेतृत्व पर भरोसा जता चुके हैं और उनके गुट में शामिल होने के लिए तैयार हैं। इसे लेकर राजनीतिक हलकों में “ऑपरेशन टाइगर” की चर्चा शुरू हो गई है।

हालांकि उद्धव ठाकरे गुट इन दावों को खारिज कर रहा है, लेकिन लगातार सामने आ रही खबरों ने पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है।

2022 की बगावत की यादें फिर ताजा

मौजूदा घटनाक्रम ने 2022 की उस बड़ी राजनीतिक बगावत की यादें फिर ताजा कर दी हैं, जब एकनाथ शिंदे ने शिवसेना के अधिकांश विधायकों के साथ विद्रोह कर महा विकास अघाड़ी सरकार को गिरा दिया था। बाद में चुनाव आयोग और न्यायिक प्रक्रियाओं के बाद शिंदे गुट को आधिकारिक शिवसेना और पार्टी के चुनाव चिह्न पर अधिकार मिल गया था।

अब यदि सांसदों का एक बड़ा वर्ग भी उद्धव ठाकरे का साथ छोड़ता है तो यह शिवसेना (यूबीटी) के लिए एक और बड़ा राजनीतिक झटका साबित हो सकता है।

नजरें अगले राजनीतिक घटनाक्रम पर

महाराष्ट्र की राजनीति में बढ़ती बयानबाजी और दल-बदल की अटकलों के बीच अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या वास्तव में शिवसेना (यूबीटी) में एक और बड़ी टूट होने जा रही है या फिर यह केवल राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति है। फिलहाल ‘शेर’ और ‘कुत्ते’ की सियासी उपमाओं ने महाराष्ट्र की राजनीति को एक बार फिर गर्मा दिया है।

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