“उत्तर प्रदेश भाजपा में नई संगठनात्मक टीम के गठन में जातीय, क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। मिशन 2027 की तैयारी के बीच राष्ट्रीय, प्रदेश और क्षेत्रीय इकाइयों के गठन में देरी से पार्टी की चुनावी रणनीति प्रभावित हो सकती है।“
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की आहट तेज हो चुकी है और सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी रणनीतियों को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। लेकिन देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी भाजपा अभी तक अपनी नई संगठनात्मक टीम को अंतिम रूप नहीं दे सकी है। प्रदेश, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय इकाइयों के गठन को लेकर पार्टी के भीतर जातीय, क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन साधने की कवायद जारी है, जिससे संगठनात्मक पुनर्गठन में अपेक्षा से अधिक समय लग रहा है।
तीन स्तरों के संगठन ने बढ़ाई चुनौती
भाजपा के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती राष्ट्रीय, प्रदेश और क्षेत्रीय इकाइयों का गठन एक साथ करना है। पार्टी सूत्रों के अनुसार इन तीनों स्तरों पर पदाधिकारियों की नियुक्ति आपस में जुड़ी हुई है। किसी एक स्तर पर लिए गए निर्णय का असर दूसरे स्तर पर पड़ रहा है, जिससे समीकरण लगातार जटिल होते जा रहे हैं।
यही कारण है कि प्रदेश अध्यक्ष बनने के छह माह बाद भी नई प्रदेश कार्यकारिणी की घोषणा नहीं हो सकी है। संगठन के विभिन्न मोर्चों और प्रकोष्ठों में भी नई नियुक्तियों का इंतजार जारी है।
मिशन-2027 की तैयारी पर असर
दिसंबर 2025 में केंद्रीय मंत्री एवं ओबीसी चेहरे पंकज चौधरी को उत्तर प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया था। माना जा रहा था कि नई टीम के गठन के बाद पार्टी विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों को और तेज करेगी।
हालांकि संगठनात्मक ढांचा तैयार न होने के कारण चुनावी रणनीति के जमीनी क्रियान्वयन में देरी हो रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में नए पदाधिकारियों को संगठनात्मक जिम्मेदारियां समझने और क्षेत्र में सक्रिय होने में कई महीने लग सकते हैं।
राष्ट्रीय टीम में यूपी की बढ़ती दावेदारी
भाजपा के अंदर इस बार उत्तर प्रदेश से अधिक संख्या में नेताओं को राष्ट्रीय संगठन में जगह मिलने की संभावना जताई जा रही है। लेकिन यही संभावना प्रदेश संगठन के गठन में नई चुनौती भी पैदा कर रही है।
यदि किसी क्षेत्र या जिले के नेता को राष्ट्रीय टीम में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलती है तो उसी क्षेत्र को प्रदेश संगठन में समान प्रतिनिधित्व देना कठिन हो जाता है। पार्टी नेतृत्व क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने के लिए हर निर्णय को सावधानीपूर्वक लेने की कोशिश कर रहा है।
जातीय समीकरणों में फंसा संगठन
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा इस बार संगठन में सामाजिक प्रतिनिधित्व को और व्यापक बनाना चाहती है। पार्टी पिछड़े वर्ग (ओबीसी), अनुसूचित जाति और महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर विशेष ध्यान दे रही है।
समाजवादी पार्टी के पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) राजनीतिक अभियान का मुकाबला करने के लिए भाजपा संगठन में ओबीसी और दलित समुदाय के नेताओं को अधिक अवसर देने की रणनीति पर काम कर रही है।
इसके साथ ही महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की भी योजना है। ऐसे में विभिन्न वर्गों के बीच संतुलन बनाना संगठन के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
क्षेत्रीय अध्यक्षों के चयन पर भी मंथन
भाजपा के छह क्षेत्रीय संगठनों के लिए अध्यक्षों के चयन को लेकर भी गहन विचार-विमर्श जारी है। सूत्रों के अनुसार छह में से कम से कम तीन क्षेत्रीय अध्यक्ष ओबीसी समाज से बनाए जा सकते हैं।
पार्टी यह भी सुनिश्चित करना चाहती है कि पश्चिम, पूर्वांचल, अवध, बुंदेलखंड, काशी और ब्रज क्षेत्र सहित सभी इलाकों को संतुलित प्रतिनिधित्व मिले। इसी कारण प्रत्येक नाम पर कई स्तरों पर चर्चा हो रही है।
सवर्ण प्रतिनिधित्व भी बना मुद्दा
संगठन में ओबीसी, दलित और महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने की रणनीति के बीच सवर्ण वर्ग के प्रतिनिधित्व को लेकर भी पार्टी को संतुलन साधना पड़ रहा है। हाल के कुछ मुद्दों पर सवर्ण समाज की नाराजगी की चर्चाओं ने भाजपा नेतृत्व की चिंताओं को बढ़ाया है।
पार्टी नहीं चाहती कि किसी भी वर्ग को प्रतिनिधित्व के मामले में उपेक्षित महसूस हो। इसलिए संगठनात्मक ढांचे को अंतिम रूप देने में अपेक्षा से अधिक समय लग रहा है।
चुनावी वर्ष से पहले बढ़ा दबाव
विधानसभा चुनाव में अब सात माह से भी कम समय शेष रहने के कारण संगठन गठन में हो रही देरी को लेकर पार्टी के भीतर भी बेचैनी है। माना जा रहा है कि जल्द ही राष्ट्रीय और प्रदेश नेतृत्व के बीच अंतिम दौर की बैठकों के बाद नई टीम की घोषणा की जा सकती है।
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