“महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना (UBT) को बड़ा झटका लगा है। विधान परिषद सदस्य सचिन अहीर ने उद्धव ठाकरे का साथ छोड़कर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले शिवसेना गुट में शामिल होने के साथ ही डिप्टी स्पीकर पद के लिए नामांकन भी दाखिल किया है।“
मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना (यूबीटी) के लिए मुश्किलें लगातार बढ़ती दिखाई दे रही हैं। पार्टी के विधान परिषद सदस्य सचिन अहीर ने उद्धव ठाकरे का साथ छोड़कर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले शिवसेना गुट में शामिल होने का फैसला किया है। इसके साथ ही उन्होंने महायुति उम्मीदवार के रूप में विधान परिषद के उपसभापति (डिप्टी स्पीकर) पद के लिए अपना नामांकन भी दाखिल कर दिया है।
नामांकन के दौरान महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और सुनेत्रा पवार उनके साथ मौजूद रहे, जिससे इस राजनीतिक घटनाक्रम को और अधिक महत्व मिल गया।
छह सांसदों के बाद एक और बड़ा झटका
सचिन अहीर का यह कदम ऐसे समय आया है जब हाल ही में उद्धव ठाकरे खेमे के छह लोकसभा सांसद भी औपचारिक रूप से एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो चुके हैं। इनमें संजय हरिभाऊ जाधव, भाऊसाहेब राजाराम वाकचौरे, ओमप्रकाश निंबालकर, संजय दीना पाटिल, संजय उत्तमराव देशमुख और नागेश पाटिल अष्टिकर शामिल हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2022 में शिवसेना में हुई बड़ी टूट के बाद यह घटनाक्रम उद्धव ठाकरे के लिए एक और महत्वपूर्ण राजनीतिक चुनौती बनकर सामने आया है।
उद्धव ठाकरे ने उठाए सवाल
हाल ही में धाराशिव में आयोजित एक जनसभा में उद्धव ठाकरे ने पार्टी में हो रहे विभाजन पर सवाल उठाते हुए कहा था कि शिवसेना और महाराष्ट्र की पहचान को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है।
उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य में निवेश और उद्योग महाराष्ट्र से बाहर जा रहे हैं और इससे राज्य के विकास पर असर पड़ रहा है।
संजय राउत का पलटवार
शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत ने बागी नेताओं पर निशाना साधते हुए कहा कि यदि उन्हें अपने फैसले पर भरोसा है तो उन्हें इस्तीफा देकर दोबारा जनता के बीच जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जनता तय करेगी कि वह वफादारों के साथ खड़ी है या गद्दारों के साथ।
महाराष्ट्र की राजनीति पर क्या होगा असर?
सचिन अहीर के शिंदे गुट में शामिल होने से विधान परिषद में महायुति की स्थिति और मजबूत हो सकती है। वहीं, शिवसेना (यूबीटी) के लिए संगठनात्मक स्तर पर नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। आने वाले स्थानीय निकाय और विधानसभा चुनावों से पहले यह राजनीतिक घटनाक्रम महाराष्ट्र की राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
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