“गुजरात हाई कोर्ट ने एक अनोखे मामले में मृत शिक्षक हर्षद भावसार की नियुक्ति रद्द करने के सरकारी आदेश को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि तीन दशक बाद नियुक्ति रद्द करना उचित नहीं है और विधवा को फैमिली पेंशन बहाल रखने का आदेश दिया।”
अहमदाबाद। गुजरात हाई कोर्ट ने एक बेहद अनोखे और कानूनी रूप से चर्चित मामले में ऐसा फैसला दिया है, जिसने सभी को हैरान कर दिया है। कोर्ट ने एक ऐसे शिक्षक की नियुक्ति को बहाल करने का आदेश दिया है जिनकी मृत्यु 17 साल पहले हो चुकी है। यह मामला शिक्षक हर्षद भावसार से जुड़ा है, जिनकी नियुक्ति को राज्य सरकार ने वर्ष 2021 में रद्द कर दिया था।
1988 में हुई थी नियुक्ति, 2004 में हो गई थी मृत्यु
जानकारी के अनुसार, हर्षद भावसार और अन्य शिक्षकों की नियुक्ति वर्ष 1988 में एक स्कूल में की गई थी, जिसे बाद में जिला शिक्षा अधिकारी ने 1989 में नियमित कर दिया था। हर्षद भावसार की वर्ष 2004 में मृत्यु हो गई थी, जिसके बाद उनकी पत्नी को पारिवारिक पेंशन मिल रही थी।
2021 में रद्द की गई थी नियुक्ति
वर्ष 2021 में राज्य सरकार ने एक पुराने आदेश के आधार पर हर्षद भावसार सहित कई शिक्षकों की नियुक्ति को रद्द कर दिया था। इस फैसले के बाद कर्मचारियों के सभी लाभ रोक दिए गए, एम्प्लॉई नंबर ब्लॉक कर दिए गए और पेंशन भुगतान भी बंद कर दिया गया था।
हाई कोर्ट में पहुंचा मामला
सरकारी आदेश के खिलाफ प्रभावित कर्मचारियों और स्कूल ट्रस्ट ने गुजरात हाई कोर्ट का रुख किया। इसमें मृत शिक्षक की पत्नी भी शामिल थीं, जिन्होंने पेंशन बहाली की मांग की।
कोर्ट ने सरकार का आदेश खारिज किया
मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट कहा कि तीन दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद नियुक्ति को रद्द करना कानूनी रूप से उचित नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि जब सरकार वर्षों तक नियुक्ति को स्वीकार कर लाभ देती रही, तो इतने लंबे समय बाद उसे चुनौती नहीं दी जा सकती।
कोर्ट ने कहा कि मृत कर्मचारी की पत्नी को पहले से पेंशन मिल रही थी, इसलिए उसे अचानक रोकना न्यायसंगत नहीं है।
विधवा को राहत, पेंशन बहाल रखने का आदेश
अदालत ने सरकार की अपील को खारिज करते हुए निर्देश दिया कि विधवा को फैमिली पेंशन का लाभ जारी रखा जाए। साथ ही यह भी माना गया कि लंबे समय बाद प्रशासनिक फैसलों को पलटना कानून के सिद्धांतों के खिलाफ है।
कानूनी हलकों में चर्चा का विषय
इस फैसले को कानूनी हलकों में एक असामान्य लेकिन महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है, जिसमें कोर्ट ने प्रशासनिक स्थिरता और वर्षों पुराने मामलों में अंतिमता (finality) के सिद्धांत पर जोर दिया है।
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