“बांकेबिहारी मंदिर चढ़ावा विवाद में सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद जगमोहन में अर्पित चढ़ावा भी मंदिर कोष में जमा होगा। जानिए सेवायतों के अधिकार, पुरानी व्यवस्था और आदेश का पूरा असर।“
वृंदावन (मथुरा)। ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर में चढ़ावे को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद सेवायतों की चिंता बढ़ गई है। न्यायालय ने मंदिर में श्रद्धालुओं की ओर से अर्पित की जाने वाली दानराशि का एक-एक पैसा मंदिर कोष में जमा करने का निर्देश दिया है। इसके दायरे में जगमोहन में अर्पित होने वाला चढ़ावा भी आ रहा है। इससे वर्षों से चली आ रही चढ़ावे की व्यवस्था में बदलाव की स्थिति बन गई है।
मंदिर में अभी तक दान पेटिका, कार्यालय, ऑनलाइन माध्यम और चेक के जरिए मिलने वाली राशि मंदिर प्रबंधन के कोष में जमा होती रही है। वहीं, गर्भगृह और जगमोहन में श्रद्धालुओं की ओर से अर्पित किए जाने वाले चढ़ावे को लेकर सेवायतों के अधिकार की परंपरा रही है। सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद जगमोहन में मिलने वाले चढ़ावे पर भी मंदिर कोष का अधिकार माना जा रहा है।
एक सेवा में मिलता है लाखों रुपये का चढ़ावा
बांकेबिहारी मंदिर में सुबह और शाम अलग-अलग सेवायत सेवा करते हैं। श्रद्धालु पूजा-अर्चना के दौरान जगमोहन में दानराशि, पोशाक, आभूषण और अन्य सामग्री अर्पित करते हैं। मंदिर से जुड़े लोगों के अनुसार, एक सेवा के दौरान मिलने वाला चढ़ावा कई बार लाखों रुपये तक पहुंच जाता है।
ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश से सेवायतों की आय पर सीधा असर पड़ने की संभावना है। अब तक जिस चढ़ावे को सेवायतों की पारंपरिक आय का हिस्सा माना जाता रहा है, उसके मंदिर कोष में जमा होने की व्यवस्था उनके लिए महत्वपूर्ण बदलाव होगी।
1939 की स्कीम को लेकर सेवायतों में मतभेद
मंदिर की चढ़ावा व्यवस्था को लेकर सेवायतों के बीच अलग-अलग दावे भी सामने आए हैं। उच्चाधिकार प्राप्त प्रबंधन समिति में शामिल सेवायत रजत गोस्वामी के अनुसार, वर्ष 1939 में तय की गई स्कीम के तहत गोलक और कार्यालय में जमा होने वाला दान मंदिर कोष में जमा किया जाता है।
उनका कहना है कि गर्भगृह और जगमोहन में श्रद्धालुओं की ओर से अर्पित चढ़ावे पर संबंधित सेवायत का अधिकार रहा है। इसी परंपरा के आधार पर वर्षों से मंदिर की व्यवस्था चलती आई है। अब सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश से इस व्यवस्था में बदलाव की स्थिति पैदा हुई है।
कुछ सेवायतों ने आदेश को बताया उचित
वहीं, मंदिर सेवायत अशोक गोस्वामी ने सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश को उचित बताया है। उनका कहना है कि मंदिर की स्कीम में चढ़ावे को लेकर मंदिर कोष के अधिकार का स्पष्ट उल्लेख है।
उन्होंने कहा कि यदि कोई श्रद्धालु स्पष्ट रूप से यह कहता है कि उसके द्वारा दिया गया चढ़ावा किसी विशेष सेवायत को दिया जाए तो उस स्थिति को अलग माना जा सकता है। लेकिन सामान्य रूप से मंदिर में अर्पित चढ़ावे पर मंदिर कोष का अधिकार होना चाहिए।
आपसी विवाद और मंदिर व्यवस्था पर भी उठे सवाल
मंदिर सेवायत और उच्चाधिकार प्राप्त प्रबंधन समिति के पूर्व सदस्य दिनेश गोस्वामी ने भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सेवायतों के बीच लंबे समय से चले आ रहे मतभेदों का मुद्दा उठाते हुए कहा कि आपसी विवाद और मनमानी के कारण मंदिर की सेवा परंपराएं प्रभावित हुई हैं।
उनका आरोप है कि कुछ मामलों में आर्थिक हितों के कारण परंपराओं से समझौता किया गया। उन्होंने कहा कि सेवायत परिवारों के बीच आपसी मतभेद के कारण मंदिर की अपनी कमेटी का गठन भी नहीं हो सका।
चांदी के रथ और शेषनाग की परंपरा पर भी होगी चर्चा
सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान ठाकुरजी के चांदी के रथ, शेषनाग और अन्य धार्मिक परंपराओं से जुड़े चढ़ावे के अधिकार पर भी चर्चा हुई। न्यायालय के आदेश के बाद इन मामलों को लेकर भी सेवायतों के बीच मंथन शुरू हो गया है।
सेवायत रजत गोस्वामी के अनुसार, अगले एक-दो दिन में सभी सेवायतों की बैठक बुलाई जाएगी। बैठक में सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश और मंदिर की पुरानी परंपराओं पर विस्तार से चर्चा होगी। इसके बाद न्यायालय के समक्ष मंदिर की ओर से क्या पक्ष रखा जाए, इस पर सहमति बनाने का प्रयास किया जाएगा।
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश ने बांके बिहारी मंदिर में चढ़ावे की व्यवस्था को लेकर नई बहस खड़ी कर दी है। सबसे बड़ा बदलाव जगमोहन में अर्पित होने वाले चढ़ावे को लेकर माना जा रहा है। यदि आदेश के मुताबिक पूरी राशि मंदिर कोष में जमा होती है तो सेवायतों को मिलने वाली पारंपरिक आय पर इसका सीधा असर पड़ेगा।
फिलहाल मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। अंतिम निर्णय आने तक चढ़ावे के अधिकार और मंदिर प्रबंधन की व्यवस्था को लेकर तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट नहीं होगी। हालांकि अंतरिम आदेश ने मंदिर में चढ़ावे के संग्रह और उसके इस्तेमाल को लेकर पारदर्शिता तथा अधिकार के सवाल को केंद्र में ला दिया है।
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