“प्रयागराज में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कानपुर के एक दुष्कर्म मामले को रद्द करते हुए कहा कि लंबे समय तक सहमति से बने शारीरिक संबंधों को केवल शादी न होने के आधार पर दुष्कर्म नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने शादी का झूठा वादा और वादा पूरा न होने के बीच अंतर स्पष्ट किया।“
प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि वयस्क महिला और पुरुष के बीच लंबे समय तक सहमति से बने शारीरिक संबंधों को केवल इस आधार पर दुष्कर्म नहीं माना जा सकता कि बाद में विवाह नहीं हो सका। अदालत ने कानपुर नगर में दर्ज एक दुष्कर्म मामले की पूरी आपराधिक कार्यवाही रद करते हुए यह टिप्पणी की।
यह आदेश इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकलपीठ ने लोकेंद्र सिंह द्वारा दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों, पीड़िता के बयान और सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए माना कि प्रथम दृष्टया यह मामला दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं आता।
मामले के अनुसार पीड़िता ने 2 मार्च 2024 को कानपुर नगर के गुजैनी थाने में एफआईआर दर्ज कराई थी। शिकायत में कहा गया था कि फेसबुक के माध्यम से दोनों की पहचान हुई, जिसके बाद फरवरी 2022 में प्रेम संबंध स्थापित हुए। आरोप था कि मई 2022 में विवाह का वादा किए जाने के बाद दोनों के बीच कई बार शारीरिक संबंध बने, लेकिन नवंबर 2023 में आरोपी ने शादी से इन्कार कर दिया और बाद में किसी अन्य महिला से विवाह कर लिया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि पीड़िता ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत दर्ज अपने बयान में स्वीकार किया था कि दोनों के बीच संबंध उसकी सहमति से बने थे। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि कथित घटनाओं के समय पीड़िता 21 वर्ष से अधिक आयु की वयस्क थी और पेशे से बीमा एजेंट के रूप में कार्यरत थी।
न्यायालय ने एफआईआर की सामग्री का भी परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि शिकायत में पहली घटना की सटीक तारीख, समय और स्थान का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया था। साथ ही यह भी सामने आया कि मुकदमा उस समय दर्ज कराया गया जब पीड़िता को आरोपी के तिलक समारोह और विवाह की जानकारी मिली।
अपने आदेश में हाई कोर्ट ने कहा कि विवाह का वादा निभाने में असफल होना और शुरू से ही झूठा वादा कर किसी को धोखे में रखकर संबंध बनाना, दोनों अलग-अलग परिस्थितियां हैं। यदि यह साबित नहीं होता कि शुरुआत से ही विवाह करने का कोई इरादा नहीं था और केवल धोखे के उद्देश्य से वादा किया गया था, तो ऐसे मामले को स्वतः दुष्कर्म नहीं माना जा सकता।
अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रत्येक मामले का मूल्यांकन उसके तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए। केवल विवाह न होने के कारण सहमति से बने संबंधों को दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
इन टिप्पणियों के साथ हाई कोर्ट ने आरोपी के खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमे और उससे संबंधित समस्त न्यायिक कार्यवाही को रद कर दिया। इस फैसले को सहमति, विवाह के वादे और दुष्कर्म से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टांत के रूप में देखा जा रहा है।
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