
भारत सेवक समाज के 75वें स्थापना वर्ष पर जानिए 1952 में पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा स्थापित इस स्वैच्छिक संस्था की ऐतिहासिक यात्रा, उद्देश्य और सामाजिक सेवा कार्यक्रम।
लखनऊ। भारत सेवक समाज (Bharat Sevak Samaj) 12 अगस्त 2026 को अपने 75वें स्थापना वर्ष में प्रवेश कर रहा है। वर्ष 1952 में देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की परिकल्पना से अस्तित्व में आया यह संगठन स्वयंसेवी जनभागीदारी, सामाजिक सेवा, राष्ट्रीय एकता और कमजोर वर्गों के उत्थान को अपने प्रमुख उद्देश्यों में शामिल करता रहा है।
भारत सेवक समाज की स्थापना का मूल विचार यह था कि देश के विकास में केवल सरकारी संस्थाओं की भूमिका पर्याप्त नहीं है। आम नागरिकों की भागीदारी, श्रम, सेवा और सामाजिक जिम्मेदारी के माध्यम से भी राष्ट्र निर्माण को मजबूत किया जा सकता है।
12 अगस्त 1952 को हुई थी स्थापना
प्रस्तुत जानकारी के अनुसार भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने योजना आयोग की जनसहयोग सलाहकार समिति की संस्तुति के आधार पर 12 अगस्त 1952 को भारत सेवक समाज की स्थापना की थी।
इसे एक गैर-राजनीतिक और स्वैच्छिक समाजसेवी संस्था के रूप में विकसित करने की परिकल्पना की गई थी। संस्था के गठन के पीछे उद्देश्य था कि समाज के विभिन्न वर्गों के लोग एक मंच पर आकर राष्ट्र निर्माण और जनकल्याण के कार्यों में योगदान दें।
नेहरू स्वयं जीवन पर्यंत संस्था के अध्यक्ष रहकर इसके कार्यों का मार्गदर्शन करते रहे। बाद में भारत रत्न गुलजारीलाल नंदा ने संस्था के अध्यक्ष के रूप में इसकी जिम्मेदारी संभाली।
वर्तमान नेतृत्व में सेवा गतिविधियों को आगे बढ़ाने का प्रयास
प्रस्तुत विवरण के अनुसार वर्तमान में संस्था के राष्ट्रीय चेयरमैन के रूप में स्वामी केशवानंद जी महाराज भारत सेवक समाज के संचालन और निर्देशन की जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में गोपबन्धु पटनायक, सेवानिवृत्त अपर मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश, चेयरमैन तथा आलोक रंजन, सेवानिवृत्त मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश, वाइस चेयरमैन के रूप में संस्था से जुड़े हुए हैं।
जनभागीदारी को बनाया गया था मूल आधार
भारत सेवक समाज की स्थापना के पीछे पंडित जवाहरलाल नेहरू की मूल सोच यह थी कि भारत का सर्वांगीण विकास तभी संभव है, जब समाज के सभी वर्ग विकास की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लें।
बालक हों या वृद्ध, महिला हों या पुरुष, सरकारी कर्मचारी हों या गैर-सरकारी क्षेत्र से जुड़े नागरिक—सभी की सामूहिक भागीदारी को संस्था के कामकाज का महत्वपूर्ण आधार बनाया गया।
उत्तर प्रदेश में भी रहा महत्वपूर्ण योगदान
केंद्रीय स्तर पर स्थापना के बाद उत्तर प्रदेश में भी भारत सेवक समाज का विस्तार हुआ। उपलब्ध विवरण के अनुसार 1958 में कानपुर नगर में भारत सेवक समाज का प्रथम अखिल भारतीय महासम्मेलन आयोजित किया गया था, जिसमें पंडित जवाहरलाल नेहरू स्वयं शामिल हुए थे।
उस दौर में उत्तर प्रदेश में संगठन का विस्तार तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष श्री आत्माराम गोविंद खेर की अध्यक्षता में हुआ। प्रदेश के विभिन्न नगरों और जनपदों में संस्था की इकाइयां स्थापित की गईं।
आत्माराम गोविंद खेर के निधन के बाद राम सिंह खन्ना, तत्कालीन नगर विकास मंत्री, उत्तर प्रदेश को संस्था का प्रदेश अध्यक्ष मनोनीत किए जाने का उल्लेख भी उपलब्ध सामग्री में किया गया है।
1987 में संगठन को मिला नया आधार
प्रस्तुत विवरण के अनुसार वर्ष 1987 में तत्कालीन गृह मंत्री गोपीनाथ दीक्षित को भारत सेवक समाज का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। उनके प्रयासों से तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने संस्था को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई।
इसके बाद नारायण दत्त तिवारी के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने पर भी संस्था को सहयोग मिलने का उल्लेख किया गया है। तत्कालीन राज्यपाल मोतीलाल वोरा की ओर से भी संस्था को मजबूत करने के लिए मार्गदर्शन और सहयोग दिए जाने की जानकारी दी गई है।
सामाजिक सेवा से लेकर ग्रामीण विकास तक व्यापक कार्यक्रम
भारत सेवक समाज के कार्यक्षेत्र को केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रखा गया। संस्था की गतिविधियों में राष्ट्रीय एकता, सामाजिक सद्भाव, ग्रामीण विकास, शिक्षा, पर्यावरण, महिला एवं छात्र शक्ति, कमजोर वर्गों का उत्थान और आपदा राहत जैसे विषय शामिल रहे हैं।
संस्था की ओर से बताए गए प्रमुख कार्यक्रमों में—राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देना।भ्रष्टाचार, कालाबाजारी और मिलावट के खिलाफ जनजागरूकता।छात्र और महिला शक्ति का रचनात्मक उपयोग।परिवार कल्याण तथा निर्बल वर्गों के उत्थान के लिए कार्य।प्रौढ़ शिक्षा और ग्रामीण विकास।सूखा एवं बाढ़ प्रभावित लोगों की सहायता।वृक्षारोपण और प्रदूषण नियंत्रण के प्रति जागरूकता।वृद्ध, विधवा, दिव्यांग और निराश्रित लोगों की सहायता।नेत्र शिविरों का आयोजन।सार्वजनिक पुस्तकालय और वाचनालय स्थापित करना।बच्चों में खेलों के माध्यम से राष्ट्रीय एकीकरण की भावना विकसित करना।महापुरुषों की जयंती और पुण्यतिथि पर कार्यक्रम आयोजित करना।गर्मी में प्याऊ और सर्दी में अलाव की व्यवस्था।ग्रामीण समस्याओं के अध्ययन के लिए प्रशिक्षण शिविर।सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से जनचेतना।अनुसूचित जाति और जनजाति के सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिए योजनाओं का लाभ पहुंचाना।दहेज और मद्यनिषेध जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जनजागरूकता।
नेहरू की सोच में जनशक्ति थी राष्ट्र निर्माण की ताकत
भारत सेवक समाज से जुड़े विचारों में पंडित जवाहरलाल नेहरू की जनशक्ति को राष्ट्र निर्माण में लगाने की अवधारणा को प्रमुख स्थान दिया गया है।
संस्था के प्रस्तुत साहित्य के अनुसार नेहरू का मानना था कि भारत सेवक समाज किसी राजनीतिक दल की संस्था नहीं, बल्कि ऐसे सभी नागरिकों के लिए मंच है जो अपनी मेहनत, समय और संसाधनों का कुछ हिस्सा कमजोर और जरूरतमंद लोगों की सहायता में लगाना चाहते हैं।
इंदिरा गांधी ने भी स्वयंसेवी संस्थाओं की भूमिका को बताया महत्वपूर्ण
संस्था से जुड़े प्रेरक विचारों में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कथन का भी उल्लेख मिलता है। उनके अनुसार समाज में हर काम के लिए सरकार पर निर्भर रहने की प्रवृत्ति को बदलने और गैर-सरकारी जनशक्ति को संगठित करने की आवश्यकता है।
स्वैच्छिक संस्थाओं के माध्यम से लोगों में सेवा, लगन और त्याग की भावना विकसित होने की बात भी इस विचारधारा में कही गई है।
गुलजारीलाल नंदा और राजीव गांधी के विचार
संस्था के उपलब्ध साहित्य में गुलजारीलाल नंदा के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि देश के सामने मौजूद अनेक समस्याओं का समाधान उन लोगों की सक्रिय भागीदारी से संभव है, जिनमें निःस्वार्थ सेवा की भावना हो।
वहीं पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के विचारों में भी स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया गया है। उनके अनुसार समाज के कमजोर, निराश्रित और दिव्यांग लोगों की सहायता में स्वैच्छिक संगठनों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।
75वें स्थापना वर्ष में सेवा का संकल्प
भारत सेवक समाज के 75वें स्थापना वर्ष का अवसर संस्था की ऐतिहासिक यात्रा को याद करने के साथ-साथ उसके मूल उद्देश्यों को फिर से समाज के सामने रखने का अवसर भी है।
राष्ट्रीय एकता, सामाजिक सद्भाव, जनभागीदारी, पर्यावरण संरक्षण, शिक्षा, ग्रामीण विकास और जरूरतमंदों की सहायता जैसे मुद्दे आज भी प्रासंगिक हैं।
संस्था से जुड़े प्रदेश सचिव एवं प्रभारी-लखनऊ मंडल ज्ञानी त्रिवेदी के अनुसार भारत सेवक समाज की मूल भावना यही है कि समाज के सभी वर्ग मिलकर राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दें और अपनी क्षमता का एक हिस्सा जरूरतमंद लोगों की सेवा में लगाएं।
उनका कहना है कि भारत सेवक समाज का उद्देश्य किसी राजनीतिक विचारधारा को आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि विभिन्न धर्मों, वर्गों और विचारों से जुड़े लोगों को सामाजिक सेवा के साझा मंच पर जोड़ना है।








