भारत-चीन रिश्तों पर बड़ा सवाल: सरकारी टेंडर में चीनी कंपनियों की एंट्री से बहस तेज

भारत-चीन संबंधों को लेकर नई बहस छिड़ गई है। एक्सपर्ट ब्रह्मा चेलानी ने दावा किया है कि भारत चीन की शर्तों पर रिश्ते सुधार रहा है और सरकारी टेंडरों में चीनी कंपनियों की एंट्री से सुरक्षा व निर्भरता को लेकर सवाल उठे हैं।

नई दिल्ली। भारत और चीन के बीच संबंधों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। जियोपॉलिटिकल विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी द्वारा सोशल मीडिया पर किए गए दावों के बाद सरकार की चीन नीति को लेकर सवाल उठने लगे हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि भारत धीरे-धीरे चीन के साथ संबंध सामान्य करने की दिशा में बढ़ रहा है और कुछ मामलों में उसकी शर्तों को स्वीकार किया जा रहा है।

‘लद्दाख विवाद के बाद रिश्तों में ठहराव’

विशेषज्ञ के अनुसार 2020 में पूर्वी लद्दाख में सीमा तनाव और सैन्य गतिरोध के बाद भारत-चीन संबंध लंबे समय तक तनावपूर्ण रहे। हालांकि हाल के समय में दोनों देशों के बीच कूटनीतिक और आर्थिक स्तर पर संपर्कों में धीरे-धीरे सुधार देखा गया है।

चीनी कंपनियों की टेंडर में भागीदारी पर सवाल

चेलानी के दावों के अनुसार, भारत ने कथित तौर पर चार चीनी कंपनियों को सार्वजनिक क्षेत्र के पावर इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े सरकारी टेंडरों में बोली लगाने की अनुमति दी है। उन्होंने चिंता जताई कि चीनी कानूनों के तहत इन कंपनियों पर बीजिंग का नियंत्रण रहता है, जिससे रणनीतिक सुरक्षा जोखिम बढ़ सकते हैं।

‘चीन पर बढ़ती निर्भरता’ का दावा

विशेषज्ञ ने यह भी दावा किया कि भारत की चीन पर औद्योगिक और सप्लाई चेन निर्भरता बढ़ी है, जबकि 2020 के बाद इसे कम करने की दिशा में प्रयास किए गए थे। उनके अनुसार, द्विपक्षीय व्यापार में चीन का सरप्लस लगातार बढ़ रहा है, जो आर्थिक असंतुलन का संकेत देता है।

रणनीतिक सुरक्षा को लेकर चिंता

उन्होंने पश्चिमी देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि कई देश अपने पावर ग्रिड और महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर को विदेशी विशेषकर चीनी कंपनियों के प्रभाव से बचाने के लिए सख्त नियम अपना रहे हैं। आशंका जताई गई है कि ऐसे नेटवर्क्स पर नियंत्रण किसी भी भू-राजनीतिक संकट में जोखिम पैदा कर सकता है।

नीति पर बहस तेज

इन दावों के बाद भारत की विदेश और आर्थिक नीति को लेकर बहस तेज हो गई है। हालांकि सरकार की ओर से इस विषय पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। विशेषज्ञों के बीच इस मुद्दे पर अलग-अलग राय देखने को मिल रही है—कुछ इसे व्यावहारिक कूटनीति मान रहे हैं, तो कुछ इसे रणनीतिक जोखिम के रूप में देख रहे हैं।

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