लखनऊ में दुर्लभ गीता और रामचरितमानस पांडुलिपि देखकर लोग रह गए हैरान

लखनऊ राजकीय अभिलेखागार में आयोजित कार्यशाला में भारतीय ज्ञान परंपरा और प्राचीन धरोहरों के संरक्षण पर हुआ मंथन

उत्तर प्रदेश राजकीय अभिलेखागार में आयोजित ज्ञानभारतम् मिशन कार्यशाला में 1794 की दुर्लभ रामचरितमानस पांडुलिपि और श्रीमद्भगवद्गीता की विशेष पांडुलिपि आकर्षण का केंद्र रहीं। जानिए प्रदर्शनी और कार्यशाला की खास बातें।

लखनऊ। राजधानी लखनऊ स्थित उत्तर प्रदेश राजकीय अभिलेखागार में बुधवार को आयोजित ‘पांडुलिपि अभिरुचि कार्यशाला’ में भारतीय ज्ञान परंपरा, इतिहास और सांस्कृतिक धरोहरों की अनमोल झलक देखने को मिली। ज्ञानभारतम् मिशन के अंतर्गत आयोजित इस विशेष कार्यशाला में 1794 की दुर्लभ रामचरितमानस पांडुलिपि और चित्रों से सुसज्जित श्रीमद्भगवद्गीता की पांडुलिपि आकर्षण का केंद्र रहीं। इन प्राचीन धरोहरों को देखने के लिए बड़ी संख्या में छात्र, शोधार्थी और विशेषज्ञ पहुंचे।

कार्यक्रम के दौरान ‘ज्ञानभारतम् निर्देशिका’ और ‘कोलोनियल लखनऊ’ नामक दो महत्वपूर्ण पुस्तकों का भी विमोचन किया गया। कार्यशाला में प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए लगभग 250 से अधिक छात्र-छात्राओं ने भाग लिया और भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ी दुर्लभ पांडुलिपियों का अवलोकन किया।

1794 की रामचरितमानस ने खींचा सबका ध्यान

प्रदर्शनी में रखी गई वर्ष 1794 की रामचरितमानस की प्राचीन हिंदी पांडुलिपि को देखने वालों की भीड़ उमड़ पड़ी। इस दुर्लभ पांडुलिपि में भगवान श्रीराम के जीवन प्रसंगों से जुड़े करीब 400 मनोहारी चित्र बनाए गए हैं। खास बात यह रही कि प्रत्येक पृष्ठ पर दोहा और चौपाई के साथ चित्रों का विस्तृत विवरण भी अंकित है, जिसने दर्शकों को बेहद प्रभावित किया।

पांडुलिपि की कलात्मकता और संरक्षण की स्थिति देखकर लोग आश्चर्यचकित रह गए। शोधार्थियों ने इसे भारतीय सांस्कृतिक विरासत का अनमोल दस्तावेज बताया।

दुर्लभ गीता पांडुलिपि भी बनी आकर्षण

कार्यक्रम में प्रदर्शित श्रीमद्भगवद्गीता की संस्कृत पांडुलिपि भी विशेष आकर्षण का केंद्र रही। वर्ष 1967 की इस दुर्लभ पांडुलिपि में भगवान श्रीकृष्ण से संबंधित सात सुंदर चित्रों के साथ गीता के सभी 700 श्लोक संकलित हैं।

पांडुलिपि की कलात्मक प्रस्तुति और श्लोकों की संरचना ने विद्यार्थियों और विशेषज्ञों को काफी प्रभावित किया। कई प्रतिभागियों ने इसे भारतीय आध्यात्मिक परंपरा और ज्ञान की अद्भुत मिसाल बताया।

भारतीय ज्ञान परंपरा को संरक्षित करने पर जोर

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए अपर मुख्य सचिव, पर्यटन, संस्कृति एवं धर्मार्थ कार्य विभाग अमृत अभिजात ने कहा कि ज्ञानभारतम् मिशन के माध्यम से देशभर की करीब एक करोड़ पांडुलिपियों को संरक्षित करने का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने कहा कि अब ऐसा मजबूत तंत्र विकसित किया जा रहा है, जिसके जरिए आम लोग भी अपनी निजी और पारिवारिक पांडुलिपियों को सुरक्षित रख सकेंगे।

उन्होंने शोधार्थियों से भारतीय इतिहास और ज्ञान परंपरा के महत्व को समझने तथा उसके संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की। उन्होंने विश्वास जताया कि पांडुलिपियों के संरक्षण के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश देश में अग्रणी राज्य बनेगा।

भारतीय ज्ञान परंपरा में छिपे हैं आधुनिक समस्याओं के समाधान

विशिष्ट अतिथि और बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के आधुनिक भारतीय इतिहास विभाग के सह-प्राध्यापक डॉ. सुशील कुमार पांडेय ने “भारतीय ज्ञान परंपरा में पांडुलिपियों का महत्व” विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय की अनेक समस्याओं और चुनौतियों के समाधान भारतीय ज्ञान परंपरा में मौजूद हैं।

उन्होंने कहा कि पांडुलिपियां केवल ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं, बल्कि हमारी बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत की जीवंत धरोहर हैं।

युवाओं को जड़ों से जोड़ने का प्रयास

पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने कहा कि उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक और ज्ञान परंपरा देश की सबसे बड़ी धरोहर है। इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाना सरकार की जिम्मेदारी है।

उन्होंने कहा कि ज्ञानभारतम् मिशन केवल पांडुलिपियों के संरक्षण का अभियान नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास, दर्शन, साहित्य और लोक ज्ञान को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह अभियान युवाओं को अपनी जड़ों और भारतीय संस्कृति से जोड़ने में अहम भूमिका निभाएगा।

डिजिटल संरक्षण पर भी जोर

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में विशेषज्ञों ने पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण और सर्वेक्षण पर विस्तृत जानकारी दी। डॉ. वंदना सिंह ने ज्ञानभारतम् पोर्टल और मोबाइल एप की उपयोगिता समझाई, जबकि लखनऊ विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के सह-प्राध्यापक डॉ. अशोक शतपथी ने राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण के महत्व पर प्रकाश डाला।

सहायक निदेशक विजय कुमार श्रीवास्तव ने पांडुलिपियों के संरक्षण और सर्वेक्षण के दौरान ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण बिंदुओं की जानकारी दी। कार्यक्रम के अंत में संस्कृति विभाग के विशेष सचिव संजय कुमार सिंह ने प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र वितरित किए।

यह कार्यशाला केवल एक प्रदर्शनी नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान, इतिहास और संस्कृति की उस समृद्ध परंपरा की झलक थी, जिसे संरक्षित रखना आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहद जरूरी माना जा रहा है।

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