“नेपाल बाढ़ की तबाही के पीछे ग्लेशियर टूटने की बड़ी वजह सामने आई है। सैटेलाइट तस्वीरों के मुताबिक करीब दो-तिहाई ग्लेशियर 1.2 किलोमीटर नीचे गिरा, जिससे बर्फ, चट्टान और गाद का तेज बहाव ‘लिक्विड कंक्रीट’ जैसी बाढ़ में बदल गया।“
काठमांडू। नेपाल-तिब्बत सीमा के पास इस सप्ताह आई भीषण बाढ़ ने व्यापक तबाही मचाई। अब इस आपदा के पीछे ग्लेशियर टूटने की एक अहम वजह सामने आई है। वैज्ञानिकों और सैटेलाइट तस्वीरों के विश्लेषण से पता चला है कि एक ऊंचाई वाले ग्लेशियर का करीब दो-तिहाई हिस्सा टूटकर लगभग 1.2 किलोमीटर नीचे गिर गया था।
बर्फ का यह विशाल हिस्सा ल्हेंडे खोला नदी के जलग्रहण क्षेत्र में गिरा। इसके बाद बर्फ, चट्टान, गाद और अन्य मलबा एक साथ नीचे की ओर बहने लगा। इस घटनाक्रम ने भोटे कोशी-त्रिशूली कॉरिडोर में अचानक और बेहद शक्तिशाली सैलाब का रूप ले लिया।
सैटेलाइट तस्वीरों ने दिखाया ग्लेशियर का टूटना
इसरो के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) द्वारा जांची गई सैटेलाइट तस्वीरों में ग्लेशियर के टूटने के स्पष्ट संकेत मिले हैं। 24 अगस्त की सेंटिनल-2 तस्वीर में ग्लेशियर सामान्य और सुरक्षित स्थिति में दिखाई दे रहा था।
वहीं, आपदा के बाद 26 अगस्त को ली गई लैंडसैट-9 की तस्वीर में ग्लेशियर के हिस्से के टूटने और नीचे गिरने का बड़ा निशान दिखाई दिया। तस्वीरों में नदी की दिशा में बर्फ और चट्टानों के एवलांच से बना चौड़ा रास्ता भी नजर आया।
इन तस्वीरों के विश्लेषण से वैज्ञानिकों को इस प्राकृतिक आपदा के घटनाक्रम को समझने में महत्वपूर्ण मदद मिली है।
करीब 1.2 किलोमीटर नीचे गिरी बर्फ
ग्लेशियर के टूटने की घटना जिस ऊंचाई पर हुई, वह भी इसकी भयावहता को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। कैलगरी विश्वविद्यालय के जियोमोर्फोलॉजिस्ट डेनियल शुगार ने प्लैनेट लैब्स की तस्वीरों के आधार पर अनुमान लगाया कि करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई पर लगभग 200 वर्ग मीटर बर्फ का हिस्सा टूट गया।
इसके बाद बर्फ का यह द्रव्यमान घाटी के तल की ओर करीब 1.2 किलोमीटर लंबवत नीचे गिरा। इतनी ऊंचाई से गिरने के कारण बर्फ में भारी गुरुत्वाकर्षण ऊर्जा पैदा हुई। नीचे आते समय यह ठोस बर्फ के एक टुकड़े की तरह नहीं रहा, बल्कि टूटकर अपने रास्ते में मौजूद दूसरी सामग्री को भी अपने साथ समेटता चला गया।
बर्फ के साथ चट्टान, गाद और पेड़ भी बहे
ग्लेशियर से शुरू हुआ एवलांच नीचे आते-आते एक बड़े मलबे के बहाव में बदल गया। अर्थ साइंसेज न्यूज़ीलैंड के प्रमुख वैज्ञानिक साइमन कॉक्स के मुताबिक, ग्लेशियर के टूटने के बाद बने मलबे के बहाव ने रास्ते में आने वाली चट्टानों, गाद, पेड़ों और अन्य सामग्री को भी अपने साथ मिला लिया।
यही वजह थी कि इसके बाद आया सैलाब सामान्य नदी की बाढ़ से कहीं ज्यादा विनाशकारी साबित हुआ। पानी के साथ भारी मात्रा में ठोस मलबा बहने के कारण इसकी मारक क्षमता कई गुना बढ़ गई।
नदी का रास्ता अस्थायी रूप से हुआ बंद
नीचे गिरती बर्फ और चट्टानों ने ल्हेंडे खोला नदी के प्रवाह को भी प्रभावित किया। भारी मात्रा में मलबा नदी में पहुंचने से उसका रास्ता कुछ समय के लिए बाधित हुआ। इसके बाद पानी और जमा हुआ मलबा तेजी से आगे बढ़ा और एक शक्तिशाली सैलाब में बदल गया।
यह बहाव आगे बढ़ते हुए भोटे कोशी-त्रिशूली कॉरिडोर तक पहुंचा। रास्ते में मौजूद ढांचों, वाहनों और अन्य वस्तुओं को भारी नुकसान पहुंचा।
क्यों कहा गया ‘लिक्विड कंक्रीट’ जैसा सैलाब?
वैज्ञानिकों के मुताबिक इस बाढ़ की सबसे खतरनाक विशेषता इसमें मौजूद मलबे की मात्रा और घनत्व था। पानी के साथ बड़ी मात्रा में कीचड़, गाद और चट्टानें शामिल हो जाने के कारण इसका प्रवाह बेहद भारी और शक्तिशाली हो गया था।
यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास एट सैन एंटोनियो के हाइड्रोलॉजिस्ट हातिम शरीफ ने ऐसे तेज कीचड़ और पानी के बहाव की तुलना ‘लिक्विड कंक्रीट’ से की। इसका मतलब यह है कि यह सिर्फ पानी का तेज बहाव नहीं था, बल्कि इसमें ठोस मलबे की इतनी बड़ी मात्रा थी कि यह रास्ते में आने वाली भारी वस्तुओं को भी बहाने में सक्षम था।
वाहनों और बड़े ढांचों तक को बहाने की ताकत
मलबे से भरा यह सैलाब अपने रास्ते में आने वाली चट्टानों, पेड़ों और दूसरे भारी सामान को भी अपने साथ बहाता चला गया। घने मलबे के कारण बहाव की ताकत इतनी अधिक थी कि वाहन और अन्य ढांचे भी इसकी चपेट में आ गए।
सामान्य बाढ़ में जहां पानी कई बार किसी वस्तु के आसपास से बह जाता है, वहीं मलबे से भरा यह प्रवाह अपने साथ बड़ी मात्रा में ठोस सामग्री लेकर आगे बढ़ रहा था। इसी वजह से इसके रास्ते में आने वाली चीजों को भारी नुकसान पहुंचा।
भूकंप मापने वाले उपकरणों में भी दर्ज हुई घटना
ग्लेशियर के ढहने और उसके बाद हुए भारी मलबे के बहाव की शक्ति का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि यह घटना भूकंप मापने वाले उपकरणों में भी दर्ज हुई।
वैज्ञानिकों के लिए यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के अस्थिर होने और अचानक ग्लेशियर टूटने से पैदा होने वाले खतरों को समझने में मदद मिल सकती है।
नेपाल की बाढ़ के पीछे सामने आया अहम कारण
नेपाल में आई इस विनाशकारी बाढ़ को समझने के लिए ग्लेशियर टूटने की यह घटना बेहद महत्वपूर्ण कड़ी मानी जा रही है। सैटेलाइट तस्वीरों और वैज्ञानिक आकलन से सामने आए घटनाक्रम के मुताबिक पहले ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटा, फिर वह करीब 1.2 किलोमीटर नीचे गिरा और रास्ते में बर्फ, चट्टान व गाद को अपने साथ लेता गया।
इसके बाद नदी का प्रवाह प्रभावित हुआ और जमा पानी व मलबे ने अचानक तेज बहाव का रूप ले लिया। यही बहाव आगे चलकर भोटे कोशी-त्रिशूली कॉरिडोर में विनाशकारी सैलाब बन गया।
इस घटना ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों के टूटने और उनसे पैदा होने वाली अचानक बाढ़ के खतरे को सामने ला दिया है। वैज्ञानिक अब ऐसी घटनाओं की निगरानी और उनके संभावित प्रभावों को बेहतर तरीके से समझने पर जोर दे रहे हैं।
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