“उत्तर प्रदेश में पिछले तीन वर्षों में बाजरा और ज्वार के उत्पादन में लगातार गिरावट दर्ज की गई है। कृषि विभाग ने मौसम और रकबे में बदलाव को वजह बताया है। जानिए कितनी घटी पैदावार और क्या है सरकार की नई रणनीति।“
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में मोटे अनाज यानी श्रीअन्न को बढ़ावा देने के सरकारी प्रयासों को झटका लगा है। प्रदेश में बाजरा और ज्वार जैसी प्रमुख फसलों का उत्पादन लगातार तीसरे वर्ष प्रभावित हुआ है। कृषि विभाग के आंकड़े बताते हैं कि पिछले तीन वर्षों में बाजरा के रकबे और उत्पादन दोनों में गिरावट दर्ज की गई है, जबकि ज्वार का रकबा बढ़ने के बावजूद उत्पादन अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच सका।
कृषि विभाग का मानना है कि बदलते मौसम, अनियमित वर्षा और मक्का जैसी अन्य फसलों के बढ़ते रकबे का असर श्रीअन्न की खेती पर पड़ा है। यही वजह है कि इस वर्ष विभाग ने उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने के लिए विशेष रणनीति तैयार की है।
बाजरा की खेती में लगातार गिरावट
प्रदेश में वर्ष 2023-24 में करीब 10 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बाजरा की बुआई हुई थी, जिससे 21.95 लाख टन उत्पादन प्राप्त हुआ था। इसके बाद वर्ष 2024-25 में रकबा घटकर 9.61 लाख हेक्टेयर रह गया और उत्पादन भी घटकर 21.03 लाख टन पर आ गया।
वर्ष 2025-26 में स्थिति और चिंताजनक रही। इस दौरान बाजरा की खेती 9.17 लाख हेक्टेयर क्षेत्र तक सिमट गई और उत्पादन घटकर 19.86 लाख टन रह गया। यानी तीन वर्षों में बाजरा के रकबे में लगभग 93 हजार हेक्टेयर और उत्पादन में 2.09 लाख टन की कमी दर्ज की गई।
ज्वार का रकबा बढ़ा, लेकिन उत्पादन घटा
ज्वार की फसल के मामले में तस्वीर थोड़ी अलग है। वर्ष 2023-24 में 2.89 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ज्वार की बुआई हुई थी और 4.63 लाख टन उत्पादन मिला था। अगले वर्ष रकबा घटकर 2.68 लाख हेक्टेयर रह गया, लेकिन बेहतर उत्पादकता के कारण उत्पादन बढ़कर 5.09 लाख टन पहुंच गया।
हालांकि वर्ष 2025-26 में कृषि विभाग रकबा बढ़ाकर 3.01 लाख हेक्टेयर तक ले जाने में सफल रहा, लेकिन उत्पादन 4.95 लाख टन ही रहा। इससे स्पष्ट है कि रकबा बढ़ने के बावजूद मौसम और अन्य कारणों से उत्पादन में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो सकी।
उत्पादकता में गिरावट बनी चिंता
कृषि विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती दोनों फसलों की घटती उत्पादकता है।
बाजरा की औसत उत्पादकता वर्ष 2023-24 में 21.73 क्विंटल प्रति हेक्टेयर थी, जो 2024-25 में बढ़कर 21.89 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हुई। लेकिन वर्ष 2025-26 में यह घटकर 21.64 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रह गई।
इसी तरह ज्वार की उत्पादकता वर्ष 2023-24 में 16 क्विंटल प्रति हेक्टेयर थी। वर्ष 2024-25 में यह बढ़कर 19.01 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पहुंच गई, लेकिन पिछले वर्ष फिर गिरकर 16.44 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रह गई।
मक्का की खेती बढ़ने से प्रभावित हुआ रकबा
कृषि विभाग के अधिकारियों के अनुसार, प्रदेश में मक्का की खेती तेजी से बढ़ी है। किसानों ने बेहतर बाजार मूल्य और मांग को देखते हुए मक्का की ओर रुख किया, जिससे बाजरा का रकबा प्रभावित हुआ। इसके अलावा मौसम में लगातार हो रहे बदलावों का असर भी फसलों की पैदावार पर पड़ा।
कृषि निदेशक डॉ. पंकज त्रिपाठी के अनुसार, कम वर्षा वाले क्षेत्रों में बाजरा और ज्वार की खेती को बढ़ावा देने की नई योजना तैयार की गई है। उन्नत बीज, आधुनिक कृषि तकनीक और वैज्ञानिक पद्धतियों के जरिए उत्पादन बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा।
इस वर्ष बड़े लक्ष्य निर्धारित
वर्तमान खरीफ सीजन के लिए कृषि विभाग ने बाजरा की 9.75 लाख हेक्टेयर में बुआई और 29.54 लाख टन उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया है। वहीं ज्वार की 3.20 लाख हेक्टेयर में खेती और 5.79 लाख टन उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है।
उत्पादकता बढ़ाने के लिए भी महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किए गए हैं। विभाग बाजरा की औसत उत्पादकता 30.30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और ज्वार की 18.10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पहुंचाने की योजना पर काम कर रहा है।
पोषण और जलवायु सुरक्षा के लिए अहम हैं मोटे अनाज
विशेषज्ञों का मानना है कि बाजरा और ज्वार जैसे मोटे अनाज कम पानी में भी बेहतर उत्पादन देने की क्षमता रखते हैं और जलवायु परिवर्तन के दौर में किसानों के लिए सुरक्षित विकल्प माने जाते हैं। साथ ही पोषण के लिहाज से भी ये फसलें अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में प्रदेश में इनके उत्पादन में गिरावट सरकार और कृषि वैज्ञानिकों दोनों के लिए चिंता का विषय बन गई है।
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