“पंचायत चुनाव 2026 को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने राज्य निर्वाचन आयोग से चुनाव की संभावित तारीख बताने को कहा है। यूपी सरकार को 10 जुलाई तक OBC आयोग की रिपोर्ट अदालत में पेश करने का निर्देश दिया गया है। ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने के आदेश पर भी सुनवाई जारी है।“
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग से महत्वपूर्ण जवाब तलब किया है। ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किए जाने के मामले में सुनवाई करते हुए कोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि वह अगली सुनवाई यानी 10 जुलाई तक पंचायत चुनाव कराए जाने की संभावित तारीख स्पष्ट करे। साथ ही चुनाव प्रक्रिया में हो रही देरी के कारणों की भी विस्तृत जानकारी अदालत के समक्ष प्रस्तुत की जाए।
खंडपीठ ने राज्य सरकार को भी निर्देश दिया है कि पंचायत चुनावों में आरक्षण निर्धारण से जुड़ी ओबीसी आयोग की रिपोर्ट अगली सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष पेश की जाए। यह आदेश न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।
प्रधानों को प्रशासक बनाने के आदेश को चुनौती
मामले में दायर जनहित याचिका में राज्य सरकार के उस निर्णय को चुनौती दी गई है, जिसके तहत प्रदेश की ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद मौजूदा ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक नियुक्त कर दिया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम के तहत ग्राम प्रधान का कार्यकाल पांच वर्ष का निर्धारित है। ऐसे में कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हें प्रशासक बनाना उनके कार्यकाल को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ाने के समान है, जो कानून की मंशा के विपरीत है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि पूर्व में जब पंचायत चुनाव समय पर नहीं हो पाए थे, तब एडीओ पंचायत अथवा अन्य सरकारी अधिकारियों को प्रशासक नियुक्त किया गया था। इस बार भी वही व्यवस्था लागू की जानी चाहिए थी।
57 हजार से अधिक ग्राम पंचायतों का कार्यकाल हुआ समाप्त
प्रदेश की 57,694 ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो गया था। इसके एक दिन पहले 25 मई को राज्य सरकार ने शासनादेश जारी कर पंचायत चुनाव संपन्न होने अथवा अधिकतम छह माह की अवधि तक मौजूदा ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने का फैसला लिया था। इसी आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई है।
OBC आरक्षण और मतदाता सूची बनी देरी की वजह
पंचायत चुनावों में देरी के पीछे कई प्रशासनिक कारण बताए जा रहे हैं। पंचायत चुनाव की मतदाता सूची का अंतिम प्रकाशन अभी तक पूरा नहीं हुआ है। इसके अलावा पंचायत चुनावों में ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए गठित किए जाने वाले आयोग की रिपोर्ट भी अभी लंबित है। सरकार का कहना है कि आरक्षण निर्धारण और निर्वाचन संबंधी प्रक्रियाओं के पूरा होने के बाद ही चुनाव कार्यक्रम घोषित किया जा सकेगा।
2021 में अधिकारियों को बनाया गया था प्रशासक
इससे पहले वर्ष 2021 में भी पंचायत चुनाव निर्धारित समय से करीब तीन महीने की देरी से कराए गए थे। उस समय कोविड महामारी और मतदाता सूची के सत्यापन में विलंब के कारण एडीओ पंचायत और बीडीओ को प्रशासक नियुक्त किया गया था। वर्ष 2000 में भी चुनाव में देरी होने पर अधिकारियों को ही पंचायतों का प्रशासक बनाया गया था।
10 जुलाई की सुनवाई पर टिकी निगाहें
हाईकोर्ट के ताजा आदेश के बाद अब प्रदेश की लाखों पंचायत प्रतिनिधियों, संभावित उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों की निगाहें 10 जुलाई की अगली सुनवाई पर टिकी हैं। माना जा रहा है कि उस दिन राज्य निर्वाचन आयोग पंचायत चुनावों की संभावित समय-सीमा और सरकार ओबीसी आरक्षण प्रक्रिया की स्थिति स्पष्ट करेगी। इसके बाद पंचायत चुनावों के कार्यक्रम को लेकर तस्वीर काफी हद तक साफ हो सकती है।
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