
अमेरिका में 3 नवंबर को मिडटर्म चुनाव होने जा रहे हैं। इन चुनावों पर पूरी दुनिया की नजर है, क्योंकि इनके नतीजे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की राजनीतिक ताकत और अमेरिकी संसद में सत्ता का संतुलन तय करेंगे। इन चुनावों से ट्रंप की राष्ट्रपति पद की कुर्सी पर सीधा खतरा नहीं होगा, लेकिन अगर उनकी रिपब्लिकन पार्टी संसद के दोनों सदनों या किसी एक सदन में बहुमत खो देती है तो उनके लिए आगे सरकार चलाना मुश्किल हो सकता है।
मिडटर्म चुनाव को राष्ट्रपति के चार साल के कार्यकाल के बीच होने वाला चुनाव कहा जाता है। इसमें राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का चुनाव नहीं होता, बल्कि अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस के सदस्यों के साथ कई राज्यों के गवर्नर और स्थानीय पदों के लिए मतदान होता है।
आखिर अमेरिका का मिडटर्म चुनाव क्या है? इसका चुनावी सिस्टम भारत से कितना अलग है? रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टी में किसका पलड़ा भारी है और अगर ट्रंप की पार्टी हार जाती है तो अमेरिकी राजनीति में क्या-क्या बदल सकता है? आइए समझते हैं।

अमेरिका में कैसे होता है मिडटर्म चुनाव?
अमेरिका में राष्ट्रपति का कार्यकाल चार साल का होता है। इस कार्यकाल के ठीक बीच में होने वाले चुनाव को मिडटर्म यानी मध्यावधि चुनाव कहा जाता है। इसमें अमेरिकी संसद के दोनों सदनों प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) और सीनेट के सदस्यों का चुनाव होता है।
इस बार प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और सीनेट की 100 में से 35 सीटों पर मतदान होना है। इसके अलावा 39 राज्यों में गवर्नर पद के लिए भी चुनाव होंगे। नई यानी 120वीं कांग्रेस जनवरी 2027 में अपना कामकाज शुरू करेगी।
अमेरिका का चुनावी सिस्टम भारत से कितना अलग?
अमेरिका की संसद को कांग्रेस कहा जाता है। इसके दो सदन हैं- प्रतिनिधि सभा और सीनेट। इनकी चुनाव प्रक्रिया और कार्यकाल भारत की लोकसभा और राज्यसभा से अलग है।
| विशेषता | प्रतिनिधि सभा | सीनेट |
|---|---|---|
| भारतीय समकक्ष | लोकसभा | राज्यसभा |
| कुल सीटें | 435 | 100 |
| सीटों का आधार | राज्यों की जनसंख्या | हर राज्य को 2 सीटें |
| कार्यकाल | 2 साल | 6 साल |
| चुनाव | हर 2 साल में सभी सीटों पर | हर 2 साल में करीब एक-तिहाई सीटों पर |
प्रतिनिधि सभा में राज्यों को उनकी जनसंख्या के आधार पर सीटें मिलती हैं, जबकि सीनेट में छोटे और बड़े सभी राज्यों को बराबर प्रतिनिधित्व दिया गया है। हर राज्य से दो सीनेटर चुने जाते हैं।
यही वजह है कि अमेरिका में राष्ट्रपति और संसद का चुनाव अलग-अलग होता है। राष्ट्रपति के पास अपना कार्यकाल पूरा करने का अधिकार रहता है, भले ही उनकी पार्टी संसद में बहुमत खो दे।
ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के पास अभी बहुमत
अमेरिका की प्रतिनिधि सभा और सीनेट में फिलहाल रिपब्लिकन पार्टी का बहुमत है। ऐसे में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अपनी नीतियों और कानूनों को आगे बढ़ाने में मदद मिलती है।
लेकिन मिडटर्म चुनाव में अगर डेमोक्रेटिक पार्टी बहुमत हासिल कर लेती है तो ट्रंप के सामने राजनीतिक चुनौतियां बढ़ सकती हैं। भारत की तरह अमेरिका में संसद का बहुमत जाने से राष्ट्रपति की कुर्सी सीधे नहीं जाती। अमेरिका में अगला राष्ट्रपति चुनाव 2028 में होना है।
20 में से 18 बार राष्ट्रपति की पार्टी को मिली हार
अमेरिका के इतिहास में मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति की पार्टी के लिए अक्सर मुश्किल साबित हुए हैं। पिछले 20 मिडटर्म चुनावों में से 18 बार राष्ट्रपति की पार्टी को प्रतिनिधि सभा में सीटों का नुकसान उठाना पड़ा है।
हालांकि, दो मौकों पर राष्ट्रपति की पार्टी इस नुकसान से बचने में सफल रही। साल 1998 में बिल क्लिंटन और 2002 में जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के कार्यकाल के दौरान ऐसा हुआ था। 2002 में 9/11 हमलों के बाद बने राजनीतिक माहौल का रिपब्लिकन पार्टी को फायदा मिला था।
पिछले मिडटर्म चुनावों में सत्ताधारी पार्टी का प्रदर्शन
अमेरिका में पिछले कुछ मिडटर्म चुनावों के नतीजे बताते हैं कि राष्ट्रपति की पार्टी को अक्सर प्रतिनिधि सभा में सीटों का नुकसान उठाना पड़ा है।
| वर्ष | राष्ट्रपति | पार्टी | प्रतिनिधि सभा में सीटों का बदलाव |
|---|---|---|---|
| 2002 | जॉर्ज डब्ल्यू. बुश | रिपब्लिकन | +8 |
| 2006 | जॉर्ज डब्ल्यू. बुश | रिपब्लिकन | -30 |
| 2010 | बराक ओबामा | डेमोक्रेटिक | -63 |
| 2014 | बराक ओबामा | डेमोक्रेटिक | -13 |
| 2018 | डोनाल्ड ट्रंप | रिपब्लिकन | -41 |
| 2022 | जो बाइडेन | डेमोक्रेटिक | -9 |
इन आंकड़ों से साफ है कि मिडटर्म चुनाव में मतदाता अक्सर राष्ट्रपति की नीतियों और सरकार के कामकाज पर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं।
सर्वे में डेमोक्रेटिक पार्टी को बढ़त
मिडटर्म चुनाव से पहले सामने आए कई ओपिनियन पोल में डेमोक्रेटिक पार्टी को रिपब्लिकन पार्टी पर बढ़त दिखाई गई है। अलग-अलग सर्वेक्षणों में डेमोक्रेटिक पार्टी के पक्ष में ज्यादा मतदाताओं ने समर्थन जताया है।
ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग में गिरावट को भी रिपब्लिकन पार्टी के लिए चुनौती माना जा रहा है। हालांकि, सर्वेक्षण चुनाव के वास्तविक नतीजों की गारंटी नहीं होते। अंतिम फैसला मतदाताओं के वोट से ही होगा।
महंगाई से लेकर ईरान युद्ध तक, इन मुद्दों पर होगा मतदान
मिडटर्म चुनाव में अमेरिकी मतदाताओं के सामने कई बड़े मुद्दे हैं। इनमें अर्थव्यवस्था, महंगाई, इमिग्रेशन, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा और विदेश नीति प्रमुख हैं।
1. महंगाई और अर्थव्यवस्था: अमेरिकी मतदाताओं के लिए रोजमर्रा के खर्च और आर्थिक स्थिति सबसे अहम मुद्दों में शामिल हैं। महंगाई और बढ़ती कीमतों को लेकर ट्रंप प्रशासन को आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है।
2. इमिग्रेशन: ट्रंप प्रशासन अवैध प्रवासियों को अमेरिका से बाहर निकालने की नीति पर जोर देता रहा है। वहीं, डेमोक्रेटिक पार्टी इस नीति के सामाजिक प्रभावों और परिवारों पर पड़ने वाले असर को लेकर सवाल उठाती रही है।
3. स्वास्थ्य सेवाएं: स्वास्थ्य सेवाओं की लागत और आम लोगों को इलाज की सुविधा मिलना भी चुनावी मुद्दा है। इस मामले में डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थकों की प्राथमिकता ज्यादा दिखाई देती है।
4. शिक्षा और लोकतंत्र: शिक्षा व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं का भविष्य भी मतदाताओं के लिए अहम है। इन मुद्दों पर दोनों पार्टियों की नीतियों में अंतर है।
5. विदेश नीति और ईरान युद्ध: ईरान के साथ तनाव और युद्ध से जुड़े हालात का असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था और पेट्रोल की कीमतों पर पड़ सकता है। इसके अलावा ट्रंप की टैरिफ नीति और दूसरे देशों के साथ संबंध भी चुनाव को प्रभावित कर सकते हैं।
अगर ट्रंप की पार्टी हारी तो सीमित हो जाएंगी राष्ट्रपति की ताकतें
अमेरिका में राष्ट्रपति की शक्तियां संविधान से मिलती हैं, केवल संसद में बहुमत से नहीं। इसलिए मिडटर्म चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की हार का मतलब यह नहीं होगा कि ट्रंप को राष्ट्रपति पद छोड़ना पड़ेगा।
हालांकि, संसद में बहुमत खोने के बाद ट्रंप के लिए अपनी नीतियों को लागू करना पहले जितना आसान नहीं रहेगा। वह पहले की तरह कार्यकारी आदेश जारी कर सकेंगे, लेकिन कानून बनाने और बजट पास कराने के लिए कांग्रेस का सहयोग जरूरी होगा।
ट्रंप की इन चार ताकतों पर पड़ सकता है असर
1. नए कानून पास कराना मुश्किल: अगर डेमोक्रेटिक पार्टी को प्रतिनिधि सभा में बहुमत मिल जाता है तो ट्रंप के लिए अपनी पसंद के टैक्स और इमिग्रेशन से जुड़े कानून पास कराना मुश्किल हो सकता है।
2. संसदीय समितियों पर विपक्ष का नियंत्रण: डेमोक्रेटिक पार्टी को समितियों का नियंत्रण मिलने पर ट्रंप प्रशासन के फैसलों और कामकाज की जांच की जा सकती है। अधिकारियों को सुनवाई के लिए बुलाया जा सकता है और दस्तावेज मांगे जा सकते हैं।
3. सरकारी बजट पर टकराव: अमेरिका में सरकारी बजट को मंजूरी देने में कांग्रेस की अहम भूमिका होती है। ऐसे में ट्रंप और डेमोक्रेटिक पार्टी के बीच सरकारी खर्च को लेकर टकराव बढ़ सकता है। सहमति नहीं बनने पर सरकारी कामकाज भी प्रभावित हो सकता है।
4. नियुक्तियों में मुश्किल: अगर सीनेट में भी डेमोक्रेटिक पार्टी को बहुमत मिल जाता है तो ट्रंप की पसंद के मंत्रियों, न्यायाधीशों और दूसरे वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्तियों को मंजूरी दिलाना कठिन हो सकता है।
हार के बाद ट्रंप को हो सकते हैं ये दो बड़े नुकसान
मिडटर्म चुनाव के बाद अमेरिका की राजनीति का ध्यान 2028 के राष्ट्रपति चुनाव पर भी जाने लगेगा। ऐसे में रिपब्लिकन पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर नए समीकरण बन सकते हैं।
1. रिपब्लिकन पार्टी पर कमजोर हो सकती है पकड़
डोनाल्ड ट्रंप अपना दूसरा राष्ट्रपति कार्यकाल पूरा कर रहे हैं। अमेरिकी संविधान के 22वें संशोधन के तहत कोई व्यक्ति दो बार से ज्यादा राष्ट्रपति नहीं चुना जा सकता। ऐसे में 2028 के चुनाव में ट्रंप तीसरी बार राष्ट्रपति नहीं बन पाएंगे।
मिडटर्म चुनाव में हार के बाद पार्टी के दूसरे नेता अपनी राजनीतिक पहचान मजबूत करने की कोशिश कर सकते हैं। इससे रिपब्लिकन पार्टी में ट्रंप का प्रभाव धीरे-धीरे कमजोर पड़ने की संभावना बन सकती है।
2. ट्रंप परिवार के क्रिप्टो कारोबार की हो सकती है जांच
ट्रंप परिवार से जुड़ी कंपनी वर्ल्ड लिबर्टी फाइनेंशियल (World Liberty Financial) भी विवादों में रही है। इस कंपनी का USD1 नाम का स्टेबलकॉइन है।
मई 2025 में अबू धाबी की निवेश फर्म MGX ने क्रिप्टो एक्सचेंज बाइनेंस में 2 अरब डॉलर के निवेश के लिए USD1 का इस्तेमाल किया था। इस सौदे को लेकर ट्रंप परिवार के कारोबारी हितों और राष्ट्रपति पद की जिम्मेदारियों के बीच संभावित टकराव पर सवाल उठे थे।
इसके अलावा कंपनी में विदेशी निवेश और ट्रंप की ओर से बाइनेंस के संस्थापक चांगपेंग झाओ को दिए गए क्षमादान को लेकर भी विवाद हुआ था। अगर डेमोक्रेटिक पार्टी को कांग्रेस में बहुमत मिलता है तो संसदीय समितियां इन मामलों की जांच कर सकती हैं।
हार से बचने के लिए क्या कर सकते हैं ट्रंप?
2020 के राष्ट्रपति चुनाव में हार के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। 6 जनवरी 2021 को उनके समर्थकों ने अमेरिकी संसद परिसर में हंगामा किया था। इस घटना ने अमेरिकी लोकतंत्र और चुनावी प्रक्रिया को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी थी।
मिडटर्म चुनाव से पहले भी चुनावी सुरक्षा, मतगणना और चुनाव प्रक्रिया में संघीय एजेंसियों की भूमिका को लेकर राजनीतिक विवाद सामने आ सकते हैं।
हालांकि, चुनाव के नतीजों को बदलने या मतदान प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने का कोई भी प्रयास कानूनी और संवैधानिक जांच के दायरे में आएगा। चुनाव कराने और नतीजे प्रमाणित करने की जिम्मेदारी निर्धारित चुनावी संस्थाओं और अधिकारियों की होती है।
गवर्नर चुनाव भी होंगे बेहद अहम
मिडटर्म चुनाव का असर केवल अमेरिकी कांग्रेस तक सीमित नहीं रहेगा। इस दौरान 39 राज्यों में गवर्नर पद के लिए भी चुनाव होंगे।
गवर्नर राज्यों में स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, सार्वजनिक सुरक्षा, ऊर्जा और आपदा प्रबंधन जैसे अहम मामलों पर फैसले लेते हैं। राज्यों की चुनावी व्यवस्था और राजनीतिक सीमाओं के निर्धारण में भी उनकी भूमिका हो सकती है।
इसलिए इन चुनावों के नतीजे अमेरिकी राज्यों की राजनीति के साथ-साथ 2028 के राष्ट्रपति चुनाव की तैयारियों को भी प्रभावित कर सकते हैं।
कुल मिलाकर, अमेरिका के मिडटर्म चुनाव ट्रंप के लिए एक बड़ी राजनीतिक परीक्षा साबित हो सकते हैं। अगर रिपब्लिकन पार्टी बहुमत बचाने में सफल रहती है तो ट्रंप को अपनी नीतियां आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी। वहीं, डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत से कांग्रेस में सत्ता का संतुलन बदल सकता है और ट्रंप प्रशासन को अगले दो साल तक विपक्ष के कड़े सवालों और जांच का सामना करना पड़ सकता है।









