“Hormuz Crisis Oil Supply Plan: होर्मुज जलडमरूमध्य संकट के बीच खाड़ी देश नई पाइपलाइन और IMEC कॉरिडोर पर काम कर रहे हैं, जिससे भारत को ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार में बड़ा फायदा मिल सकता है।“
नई दिल्ली। Iran-United States और Israel के बीच जारी संघर्ष के बीच वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर संकट गहराता जा रहा है। खासकर Strait of Hormuz के बाधित होने से दुनिया के सामने तेल-गैस सप्लाई की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। ऐसे में खाड़ी देश अब इस अहम समुद्री मार्ग पर निर्भरता कम करने के लिए वैकल्पिक रास्तों और पाइपलाइन नेटवर्क पर तेजी से विचार कर रहे हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, सामान्य हालात में दुनिया की करीब 20% तेल-गैस आपूर्ति इसी जलडमरूमध्य से होती है, लेकिन मौजूदा तनाव के चलते यहां से यातायात में भारी गिरावट आई है। ईरान द्वारा नियंत्रण बढ़ाने और चुनिंदा जहाजों को ही अनुमति देने से वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है।
वैकल्पिक योजनाओं पर तेज मंथन
खाड़ी देशों द्वारा कई बड़े विकल्पों पर काम किया जा रहा है—
- सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन का विस्तार, जो तेल को सीधे लाल सागर तक पहुंचाती है।
- यूएई की हबशान-फूजैरह पाइपलाइन, जिससे होर्मुज को बायपास किया जा सकता है।
- इराक-तुर्किये पाइपलाइन और अन्य क्रॉस-बॉर्डर नेटवर्क पर चर्चा।
- लाल सागर तट पर नए निर्यात टर्मिनल विकसित करने की योजना।
इन सभी प्रयासों का मकसद एक ही है—एकल ‘चोकपॉइंट’ पर निर्भरता खत्म कर ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित बनाना।
IMEC: भारत की अहम भूमिका
इस संकट के बीच सबसे ज्यादा चर्चा भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) की हो रही है, जिसकी पहल Narendra Modi ने जी20 शिखर सम्मेलन 2023 में की थी। यह कॉरिडोर भारत को खाड़ी देशों के रास्ते यूरोप से जोड़ने वाला एक बहुआयामी नेटवर्क होगा, जिसमें रेलवे, सड़क, बंदरगाह और पाइपलाइन शामिल होंगे।
भारत को क्या होगा फायदा?
- ऊर्जा सुरक्षा मजबूत: तेल-गैस की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित होगी।
- व्यापार में तेजी: भारत से यूरोप तक तेज और सुरक्षित व्यापार मार्ग मिलेगा।
- लागत में कमी: शिपिंग और ट्रांसपोर्ट खर्च घटेगा।
- रणनीतिक बढ़त: United Arab Emirates, Saudi Arabia, Israel और पश्चिमी देशों के साथ सहयोग मजबूत होगा।
चुनौतियां भी कम नहीं
हालांकि, इन परियोजनाओं के सामने भारी लागत, सुरक्षा जोखिम और राजनीतिक सहमति जैसी बड़ी चुनौतियां हैं। कई पाइपलाइन मार्गों पर अरबों डॉलर खर्च होने का अनुमान है, वहीं सीमा-पार नेटवर्क में देशों के आपसी मतभेद भी बाधा बन सकते हैं।
आगे का रास्ता
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा के लिए किसी एक मार्ग पर निर्भर रहने के बजाय बहु-मार्गीय नेटवर्क ही स्थायी समाधान होगा। मौजूदा संकट ने खाड़ी देशों को इस दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने के लिए मजबूर कर दिया है।
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