लिव-इन रिलेशनशिप पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: रिश्ता टूटना अपराध नहीं, रेप केस अलग मामला

सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप केस में की सख्त टिप्पणी, कहा- रिश्ता खत्म करना अपराध नहीं

Supreme Court Live-in Relationship Case: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप से बाहर निकलना अपने आप में अपराध नहीं है। सहमति से बने संबंध और यौन अपराध अलग हैं। जानिए पूरा मामला, नई दिल्ली कानूनी खबर 2026।

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप और आपसी सहमति से बने संबंधों को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी रिश्ते से बाहर निकलना अपने आप में आपराधिक अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि सहमति से बने संबंधों और यौन अपराधों के बीच स्पष्ट अंतर समझना बेहद जरूरी है।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना की पीठ ने एक महिला की याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें उसने एक व्यक्ति पर शादी का झूठा वादा कर दुष्कर्म और मारपीट का आरोप लगाया था।

कोर्ट ने पूछा- बच्चा भी है, अब रेप का आरोप क्यों?

सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले की परिस्थितियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि दोनों लंबे समय तक साथ रहे, उनका एक बच्चा भी है, फिर अब इस रिश्ते को आपराधिक मामले में कैसे बदला जा सकता है?

कोर्ट ने कहा कि जब दो बालिग लोग बिना शादी साथ रहने का फैसला करते हैं, तो ऐसे रिश्तों में कुछ जोखिम भी जुड़े होते हैं। हर टूटे रिश्ते को आपराधिक मुकदमे में नहीं बदला जा सकता।

सहमति वाले रिश्ते और यौन अपराध अलग

पीठ ने स्पष्ट किया कि आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध और जबरन बनाए गए संबंध पूरी तरह अलग कानूनी श्रेणियां हैं। इसलिए हर मामले में तथ्यों और सहमति की प्रकृति को ध्यान से देखना जरूरी है।

कोर्ट ने यह भी माना कि ऐसे सवाल कई बार महिला को शर्मिंदा करने वाले लग सकते हैं, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया में घटनाक्रम समझना जरूरी होता है।

महिला के वकील ने क्या कहा?

महिला की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि आरोपी ने शादी का वादा कर संबंध बनाए, साथ रहा और एक बच्चा भी हुआ। बाद में पता चला कि आरोपी पहले से शादीशुदा था और उसने यह तथ्य छिपाया था।

वकील ने कहा कि महिला उस समय कम उम्र की थी और भरोसे में आकर संबंध में आई थी।

बच्चे के अधिकार पूरी तरह सुरक्षित

सुनवाई के दौरान अदालत ने साफ किया कि शादी के बाहर जन्मा बच्चा “नाजायज” नहीं माना जा सकता और उसके सभी कानूनी अधिकार सुरक्षित रहेंगे।

कोर्ट ने महिला को सलाह दी कि वह बच्चे के लिए गुजारा-भत्ता और अन्य वैधानिक राहत मांग सकती है।

समझौते और मध्यस्थता की सलाह

अदालत ने दोनों पक्षों को सुझाव दिया कि यदि संभव हो तो विवाद को बातचीत और मध्यस्थता के जरिए सुलझाने की कोशिश करें।

क्यों अहम है यह टिप्पणी?

यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि हाल के वर्षों में लिव-इन रिलेशनशिप, शादी के वादे और सहमति से जुड़े मामलों में बड़ी संख्या में मुकदमे सामने आए हैं। अदालत ने संकेत दिया कि हर विवाद को आपराधिक केस के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि तथ्यों के आधार पर फैसला होना चाहिए।

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