देश में बच्चों के खिलाफ अपराध बढ़े, संसदीय समिति ने जताई गंभीर चिंता

NCRB रिपोर्ट में 2024 में 5.9% वृद्धि, अपहरण और पॉक्सो के मामले सबसे अधिक; संसद की स्थायी समिति ने की समीक्षा

बच्चों के खिलाफ अपराधों में 5.9 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई है। 2024 में देशभर में 1.87 लाख से अधिक मामले सामने आए। संसदीय स्थायी समिति ने गृह मंत्रालय और NCRB अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक कर बाल सुरक्षा, POCSO, अपहरण और साइबर अपराधों पर चिंता जताई।

नई दिल्ली। देश में बच्चों के खिलाफ बढ़ते अपराधों को लेकर संसद की गृह मामलों संबंधी स्थायी समिति ने गंभीर चिंता व्यक्त की है। भाजपा के राज्यसभा सांसद Radha Mohan Das Agrawal की अध्यक्षता वाली समिति ने गृह मंत्रालय और राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अधिकारियों के साथ अलग-अलग बैठकों में इस मुद्दे की समीक्षा की।

बैठक में समिति के सदस्यों ने देशभर में बच्चों के खिलाफ बढ़ते अपराधों पर चिंता जताते हुए प्रभावी रोकथाम, त्वरित जांच और न्यायिक प्रक्रिया को मजबूत बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

2024 में दर्ज हुए 1.87 लाख से अधिक मामले

एनसीआरबी के ताजा आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024 में बच्चों के खिलाफ अपराध के कुल 1,87,702 मामले दर्ज किए गए। यह संख्या वर्ष 2023 में दर्ज 1,77,335 मामलों की तुलना में 5.9 प्रतिशत अधिक है।

रिपोर्ट के अनुसार बच्चों के खिलाफ अपराध की राष्ट्रीय दर भी बढ़कर 42.3 मामले प्रति एक लाख बाल आबादी हो गई, जबकि वर्ष 2023 में यह दर 39.9 थी।

अपहरण और पॉक्सो मामलों का दबदबा

आंकड़ों के मुताबिक बच्चों के खिलाफ अपराधों में सबसे बड़ी हिस्सेदारी अपहरण के मामलों की रही। वर्ष 2024 में 75,108 अपहरण के मामले दर्ज हुए, जो कुल अपराधों का लगभग 40 प्रतिशत हैं।

इसके बाद दूसरे स्थान पर पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के तहत दर्ज मामले रहे। इस श्रेणी में 69,191 मामले दर्ज किए गए, जो कुल अपराधों का लगभग 36.9 प्रतिशत हैं।

इसके अतिरिक्त दुष्कर्म, यौन उत्पीड़न, पीछा करना, मानव तस्करी, बाल विवाह तथा लड़कियों की अस्मिता से जुड़े अपराध भी बड़ी संख्या में सामने आए हैं।

महाराष्ट्र सबसे ऊपर, उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर

राज्यवार आंकड़ों में महाराष्ट्र बच्चों के खिलाफ अपराध के मामलों में शीर्ष पर रहा, जहां 24,171 मामले दर्ज किए गए। इसके बाद उत्तर प्रदेश में 22,222 और मध्य प्रदेश में 21,908 मामले दर्ज हुए।

बिहार में 13,349 और तमिलनाडु में 10,046 मामले सामने आए। केंद्र शासित प्रदेशों में दिल्ली में 7,662 मामले दर्ज हुए, जो बच्चों की आबादी के अनुपात में सबसे अधिक अपराध दर वाले क्षेत्रों में शामिल है।

3.45 लाख से अधिक मामले अदालतों में लंबित

रिपोर्ट में न्यायिक व्यवस्था पर बढ़ते दबाव का भी उल्लेख किया गया है। वर्ष 2024 में पूर्व वर्षों से लंबित और नए मामलों को मिलाकर बच्चों के खिलाफ अपराध से जुड़े 3.45 लाख से अधिक मामले अदालतों में लंबित रहे।

इनमें से 40 हजार से अधिक मामलों में सुनवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ी, लेकिन बड़ी संख्या में मामले अब भी न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अपहरण, दुष्कर्म और पॉक्सो से जुड़े मामलों में लंबित मुकदमों की संख्या विशेष रूप से चिंताजनक बताई गई है।

साइबर अपराध भी बने नई चुनौती

समिति अब इस विषय पर महिला एवं बाल विकास मंत्रालय तथा इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधिकारियों से भी चर्चा करेगी। इसका उद्देश्य बच्चों की सुरक्षा से जुड़े डिजिटल खतरों की समीक्षा करना है।

बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऑनलाइन ग्रूमिंग, साइबर शोषण, बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्री का प्रसार और इंटरनेट आधारित अपराध तेजी से बढ़ती चुनौती बनते जा रहे हैं। ऐसे मामलों से निपटने के लिए कानून प्रवर्तन एजेंसियों और संबंधित मंत्रालयों के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत है।

रोकथाम और त्वरित न्याय पर जोर

विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ते मामले एक ओर जागरूकता और रिपोर्टिंग में सुधार का संकेत देते हैं, लेकिन दूसरी ओर यह बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था में मौजूद कमियों को भी उजागर करते हैं। संसदीय समिति की समीक्षा में रोकथाम की रणनीति, पीड़ित सहायता तंत्र, त्वरित न्याय और संस्थागत जवाबदेही को मजबूत बनाने पर विशेष ध्यान दिए जाने की संभावना है।

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