उत्तर भारत में मिला खतरनाक परजीवी का नया स्वरूप, इंसानों में गंभीर संक्रमण का खतरा

हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और चंडीगढ़ में भेड़ों-बकरियों पर हुए वैज्ञानिक अध्ययन में इचिनोकोकस ग्रैनुलोसस परजीवी के खतरनाक जीनोटाइप मिले हैं। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यह संक्रमण कुत्तों के माध्यम से इंसानों तक पहुंचकर हाइडेटिड रोग का कारण बन सकता है।

उत्तर भारत में इचिनोकोकस ग्रैनुलोसस परजीवी के G1, G3 और G6 जीनोटाइप मिलने से स्वास्थ्य विशेषज्ञ चिंतित हैं। यह संक्रमण जानवरों से इंसानों में फैलकर हाइडेटिड रोग, लीवर डैमेज और अन्य गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है।

नई दिल्ली। उत्तर भारत में भेड़ों और बकरियों पर किए गए एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अध्ययन ने पशु एवं मानव स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर चिंता को उजागर किया है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि इचिनोकोकस ग्रैनुलोसस (Echinococcus granulosus) नामक खतरनाक परजीवी के कई जीनोटाइप (आनुवंशिक प्रकार) उत्तर भारत में सक्रिय रूप से मौजूद हैं। यह परजीवी पशुओं से इंसानों में फैलकर सिस्टिक इचिनोकोकोसिस (हाइडेटिड रोग) जैसी गंभीर और जानलेवा बीमारी का कारण बन सकता है।

हरियाणा, हिमाचल और चंडीगढ़ में किया गया अध्ययन

यह शोध हरियाणा के हिसार स्थित लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया। शोध दल में वैज्ञानिक डॉ. पल्लवी मुदगिल, डॉ. अंशू लोहान, डॉ. अनिल के. नेहरा, डॉ. अनिल शर्मा और डॉ. अमन डी. मुदगिल शामिल रहे।

अध्ययन के दौरान हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और चंडीगढ़ के विभिन्न बूचड़खानों में कुल 1,049 भेड़ों और बकरियों की जांच की गई। संक्रमित पशुओं से लिए गए नमूनों की डीएनए जांच में वैज्ञानिकों ने जी1, जी3 और जी6 जीनोटाइप की पहचान की।

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह सामने आया कि जी6 जीनोटाइप पहली बार उत्तर भारत की भेड़ों और बकरियों में स्पष्ट रूप से पाया गया है। इससे संकेत मिलता है कि ये पशु इस परजीवी के प्रसार में पहले की अपेक्षा कहीं अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

क्या है इचिनोकोकस ग्रैनुलोसस?

इचिनोकोकस ग्रैनुलोसस एक सूक्ष्म टेपवर्म (फीताकृमि) परजीवी है, जो मुख्य रूप से कुत्तों और अन्य कैनिड प्रजातियों में पाया जाता है। इसके अंडे पशुओं और मनुष्यों के शरीर में पहुंचकर गंभीर संक्रमण पैदा कर सकते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार संक्रमित कुत्तों के मल से दूषित भोजन, पानी या सीधे संपर्क के जरिए यह परजीवी इंसानों तक पहुंच सकता है।

इंसानों में कैसे फैलती है बीमारी?

जब इस परजीवी के अंडे किसी व्यक्ति के शरीर में प्रवेश करते हैं तो उनके लार्वा शरीर के विभिन्न अंगों में पहुंचकर हाइडेटिड सिस्ट (पानी से भरी गांठ) बनाना शुरू कर देते हैं।

यह संक्रमण वर्षों तक बिना किसी स्पष्ट लक्षण के शरीर में विकसित हो सकता है। बाद में सिस्ट का आकार बढ़ने पर गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं सामने आती हैं।

लीवर और फेफड़ों पर सबसे ज्यादा असर

अध्ययन के अनुसार इस बीमारी का सबसे अधिक प्रभाव लीवर पर पड़ता है।

  • लगभग 70 प्रतिशत मामलों में लीवर प्रभावित होता है।
  • फेफड़े दूसरा सबसे अधिक प्रभावित अंग हैं।
  • गंभीर मामलों में मस्तिष्क, हड्डियां और गुर्दे भी प्रभावित हो सकते हैं।
  • यदि सिस्ट फट जाए तो शरीर में गंभीर एलर्जी प्रतिक्रिया (एनाफिलेक्सिस) हो सकती है, जो जानलेवा साबित हो सकती है।

पहले भी इंसानों में मिल चुके हैं कई जीनोटाइप

शोधकर्ताओं ने बताया कि पूर्व के अध्ययनों में उत्तर भारत के मानव मरीजों में भी जी1, जी3, जी5 और जी6 जीनोटाइप पाए जा चुके हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि पशुओं और मनुष्यों के बीच संक्रमण का चक्र सक्रिय है और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए यह एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह शोध?

वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अध्ययन परजीवी के प्रसार और उसके विभिन्न जीनोटाइप की पहचान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि संक्रमण पशुओं से मनुष्यों तक किस प्रकार पहुंच रहा है।

शोध के निष्कर्ष भविष्य में—

  • रोग की निगरानी व्यवस्था मजबूत करने,
  • संक्रमण की शीघ्र पहचान,
  • रोकथाम संबंधी कार्यक्रम तैयार करने,
  • पशुपालन क्षेत्रों में जागरूकता बढ़ाने,
  • तथा मानव स्वास्थ्य सुरक्षा रणनीतियां विकसित करने में सहायक होंगे।

विशेषज्ञों की सलाह

विशेषज्ञों ने लोगों को सलाह दी है कि—

  • पालतू कुत्तों का नियमित स्वास्थ्य परीक्षण कराएं।
  • कुत्तों को कच्चे संक्रमित अंग खाने से रोकें।
  • भोजन और पानी की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें।
  • पशुपालन क्षेत्रों में हाथ धोने और साफ-सफाई की आदत अपनाएं।
  • संदिग्ध लक्षण दिखाई देने पर तुरंत चिकित्सकीय जांच कराएं।

बढ़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य की चिंता

उत्तर भारत में पहली बार जी6 जीनोटाइप की पुष्टि ने वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। पशुओं और मनुष्यों दोनों में संक्रमण के प्रमाण मिलने से यह स्पष्ट हो गया है कि इस परजीवी की निगरानी और नियंत्रण के लिए बहु-स्तरीय रणनीति अपनाने की आवश्यकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो यह संक्रमण भविष्य में सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।

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