बच्चों को भावनात्मक साझीदार बनाइए, तभी रिश्ते होंगे सफल : प्रो. आर.एन. त्रिपाठी


बीएचयू के समाजशास्त्र विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर एवं लोक सेवा आयोग के पूर्व सदस्य प्रो. आर.एन. त्रिपाठी ने कहा कि बच्चों को केवल शिक्षा और करियर ही नहीं, बल्कि भावनात्मक संतुलन, रिश्तों की गरिमा और असफलताओं को स्वीकार करने का साहस भी सिखाना जरूरी है।

वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर एवं लोक सेवा आयोग के पूर्व सदस्य प्रो. आर.एन. त्रिपाठी ने कहा है कि वर्तमान समय में प्रेम, विश्वास और रिश्तों की पारंपरिक परिभाषाएं तेजी से बदल रही हैं। रिश्तों में संवाद की कमी, भावनात्मक अपरिपक्वता और निर्णय लेने की असमर्थता कई बार ऐसे दुखद परिणामों को जन्म देती है, जो पूरे समाज को झकझोर देते हैं।

प्रेम का आधार है विश्वास और समर्पण

प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि संत रहीम और कबीर ने प्रेम को विश्वास, समर्पण और एकनिष्ठता का प्रतीक बताया है, लेकिन आज अनेक घटनाएं संकेत दे रही हैं कि प्रेम का पवित्र भाव कहीं न कहीं स्वार्थ, अपेक्षाओं और दिखावे की भेंट चढ़ता जा रहा है। उन्होंने कहा कि किसी भी रिश्ते में मतभेद और असहमति होना स्वाभाविक है, लेकिन उसका समाधान हिंसा, छल या अपराध नहीं हो सकता।

उन्होंने कहा कि यदि कोई रिश्ता स्वीकार्य या सफल न हो सके, तो सम्मानजनक तरीके से अलग होना ही परिपक्वता और संवेदनशीलता की पहचान है।

परिवारों के लिए आत्ममंथन का समय

प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि हाल के चर्चित घटनाक्रम केवल अपराध की घटनाएं नहीं हैं, बल्कि समाज और परिवारों के लिए आत्ममंथन का विषय भी हैं। आज अभिभावक बच्चों की शिक्षा, करियर और भौतिक सुविधाओं पर तो पर्याप्त ध्यान दे रहे हैं, लेकिन उन्हें भावनात्मक संतुलन, रिश्तों की गरिमा और असफलताओं को स्वीकार करने का साहस सिखाने की आवश्यकता है।

बच्चों के अभिभावक ही नहीं, भावनात्मक साझीदार भी बनें

उन्होंने कहा कि माता-पिता को बच्चों के केवल अभिभावक नहीं, बल्कि उनके भावनात्मक साझीदार बनना चाहिए। बच्चों से नियमित संवाद करें, उनकी समस्याओं और मानसिक स्थिति को समझें तथा उन्हें यह सिखाएं कि जीवन के प्रत्येक निर्णय को विवेक, संवेदनशीलता और सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ लिया जाना चाहिए।

मजबूत संवाद से बनेगा स्वस्थ समाज

प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि परिवारों में संवाद, संस्कार और भावनात्मक शिक्षा जितनी मजबूत होगी, समाज उतना ही सुरक्षित, संतुलित और स्वस्थ बनेगा। उन्होंने कहा कि समय आ गया है कि हम केवल सफल करियर और आर्थिक उपलब्धियों पर ही नहीं, बल्कि संवेदनशील, जिम्मेदार और मानवीय व्यक्तित्व के निर्माण पर भी समान रूप से ध्यान दें।

अपने विचारों का समापन करते हुए उन्होंने प्रसिद्ध शायर की इन पंक्तियों का उल्लेख किया—

“वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन,
उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा।”

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