अयोध्या राम मंदिर के पुजारियों के ड्रेस कोड में बदलाव, अब बिना सिले पीले उत्तरीय में गर्भगृह में करेंगे प्रवेश

अयोध्या राम मंदिर में पुजारियों के ड्रेस कोड में बदलाव किया गया है। अब सभी पुजारी रामानंदाचार्य परंपरा के अनुसार बिना सिला पीले रंग का उत्तरीय वस्त्र धारण कर गर्भगृह में प्रवेश करेंगे। धार्मिक समिति ने पूजा व्यवस्था और पुजारियों के आचरण से जुड़े कई बिंदुओं पर भी निर्णय लिया।

अयोध्या। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में पूजा-अर्चना की व्यवस्था को धार्मिक परंपराओं के अनुरूप और अधिक सुव्यवस्थित करने की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है। राम मंदिर के पुजारियों के ड्रेस कोड में परिवर्तन करते हुए अब उन्हें बिना सिला पीले रंग का उत्तरीय वस्त्र धारण कर गर्भगृह में प्रवेश करना होगा। यह व्यवस्था रामानंदाचार्य परंपरा के अनुरूप लागू की जा रही है।

प्राण प्रतिष्ठा के बाद से मंदिर के पुजारियों के लिए चौबंदी धारण करने की व्यवस्था थी। अब इसमें बदलाव किया गया है। धार्मिक समिति के अनुसार सभी पुजारी सिल्क का बिना सिला उत्तरीय वस्त्र धारण करेंगे। सर्दी के मौसम में भी इसी परंपरा के अनुरूप ऊनी उत्तरीय वस्त्र पहनने की व्यवस्था रहेगी।

धार्मिक समिति की बैठक में पूजा व्यवस्था पर मंथन

श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की धार्मिक समिति की ऑनलाइन बैठक शनिवार को हुई। इसमें पुजारियों की नियुक्ति, उनके आचरण, पूजा पद्धति और मंदिर की धार्मिक परंपराओं से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया।

मंदिर में प्राचीन वैष्णव परंपरा और रामानंदाचार्य संप्रदाय की धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप पूजा व्यवस्था को स्थायी स्वरूप देने की तैयारी है। इसी क्रम में पुजारियों की दिनचर्या से लेकर पूजा-अर्चना की विधि तक के लिए नियम तैयार किए जा रहे हैं।

इन नियमों में भगवान के श्रृंगार, भोग, आरती और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों को भी शामिल किया जाएगा। बैठक में कई बिंदुओं पर निर्णय लिया गया है, जबकि शेष नियमों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।

आने वाले दिनों में लागू हो सकते हैं नए नियम

धार्मिक समिति की चर्चा के बाद माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में पूजा व्यवस्था से जुड़े नियमों को अंतिम रूप दिया जाएगा। इसके बाद इन्हें राम मंदिर की नियमित पूजा व्यवस्था में लागू किया जाएगा।

समिति के सदस्य राजकुमार दास ने बताया कि सभी पुजारी बिना सिले सिल्क के उत्तरीय वस्त्र धारण करेंगे। ठंड के मौसम में भी इसी तरह के ऊनी वस्त्र पहनने की व्यवस्था होगी। इसका उद्देश्य मंदिर की पूजा पद्धति को रामानंदाचार्य परंपरा के अनुरूप बनाए रखना है।

समिति सदस्यों ने मंदिर परिसर की व्यवस्था देखी

धार्मिक समिति के सदस्यों ने रविवार को राम मंदिर परिसर का निरीक्षण कर विभिन्न व्यवस्थाओं का जायजा लिया। ट्रस्ट के अंतरिम महासचिव कृष्ण मोहन, सदस्य महंत दिनेंद्र दास, धार्मिक समिति के सदस्य महंत मिथिलेश नंदनी शरण, राजकुमार दास, महंत रामानंद दास, महंत कमल नयन दास और आचार्य इंद्रदेव मिश्र ने मंदिर परिसर में व्यवस्थाओं का निरीक्षण किया।

इस दौरान झूलनोत्सव के आयोजन से संबंधित तैयारियों को भी देखा गया। श्रद्धालुओं के दर्शन की व्यवस्था और पुजारियों को उपलब्ध कराई जा रही सुविधाओं का भी जायजा लिया गया।

इसके बाद पालकी यात्रा और कुबेर टीला पर आयोजित होने वाले झूलनोत्सव के लिए की जाने वाली साज-सज्जा और अन्य व्यवस्थाओं पर चर्चा हुई।

मंदिर में CEO की नियुक्ति पर भी उठे सवाल

राम मंदिर की व्यवस्था के लिए मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) की नियुक्ति के मुद्दे पर धार्मिक समिति के सदस्य महंत मिथिलेश नंदनी शरण ने अपनी राय स्पष्ट की है। उन्होंने कहा कि वह मंदिर व्यवस्था के लिए किसी CEO की नियुक्ति के पक्ष में नहीं हैं।

उन्होंने कहा कि यदि CEO नियुक्त किया जाता है तो वह इसका विरोध नहीं करेंगे, लेकिन ऐसी स्थिति में उसके अधिकारों को स्पष्ट किया जाना बेहद जरूरी होगा। उनके अनुसार मंदिरों की व्यवस्था मूल रूप से CEO के माध्यम से नहीं चलनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि मंदिर की व्यवस्था का अधिकार ऐसे लोगों के पास होना चाहिए, जिनकी भगवान के प्रति निष्ठा हो और जिनका जीवन मंदिर, मठ तथा आश्रम की धार्मिक परंपराओं के बीच बीता हो।

प्रशासनिक दक्षता के साथ धार्मिक निष्ठा भी जरूरी

मिथिलेश नंदनी शरण ने कहा कि प्रशासनिक दक्षता रखने वाला व्यक्ति मंदिर की व्यवस्था संभाल सकता है, लेकिन मंदिर प्रबंधन में धार्मिक निष्ठा को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए। उनके अनुसार आशंका रहती है कि प्रशासनिक पृष्ठभूमि वाला व्यक्ति भगवान के बजाय प्रशासनिक व्यवस्था के प्रति अधिक जवाबदेह हो सकता है।

उन्होंने कहा कि देश के कई बड़े मंदिरों में CEO के माध्यम से व्यवस्थाएं संचालित हो रही हैं। ऐसे में राम मंदिर की व्यवस्था तय करते समय धार्मिक परंपरा, मंदिर की गरिमा और प्रशासनिक दक्षता के बीच संतुलन बनाना जरूरी होगा।

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