IIT बॉम्बे छात्र आत्महत्या मामला: ‘क्या नकल पर डांटने को जातिसूचक गाली माना जा सकता है?’ शिक्षाविदों ने उठाए सवाल

IIT Bombay Suicide Case: साहिल वाकोडे की मौत के बाद जातीय भेदभाव के आरोप, परीक्षा में कथित नकल और शैक्षणिक दबाव को लेकर बहस तेज है। मुंबई क्राइम ब्रांच मामले की जांच कर रही है।

मुंबई: IIT Bombay Suicide Case में द्वितीय वर्ष के छात्र साहिल वाकोडे की मौत के बाद मामला सिर्फ एक छात्र की दुखद मौत तक सीमित नहीं रहा है। घटना के बाद जातीय भेदभाव के आरोप, परीक्षा में कथित अनियमितता, शैक्षणिक दबाव और संस्थानों में छात्रों के लिए उपलब्ध सहायता व्यवस्था को लेकर बहस तेज हो गई है। मामले की जांच मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच कर रही है।

साहिल वाकोडे IIT बॉम्बे के एनर्जी साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग के द्वितीय वर्ष के छात्र थे। रिपोर्टों के मुताबिक, परीक्षा के दौरान उनके पास मोबाइल फोन पाए जाने की बात सामने आई थी। संस्थान ने बाद में कहा था कि छात्र के खिलाफ कोई औपचारिक अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं की गई थी और उन्हें काउंसलिंग देकर यह आश्वासन दिया गया था कि घटना का उनके अकादमिक करियर पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

परिवार ने लगाए जातीय भेदभाव और प्रताड़ना के आरोप

साहिल की मौत के बाद उनके परिवार ने गंभीर आरोप लगाए। पिता की शिकायत के आधार पर प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने समेत आरोपों में मामला दर्ज किए जाने की रिपोर्ट सामने आई है। परिवार ने जाति आधारित अपमान, धमकी और कथित मानसिक प्रताड़ना का भी आरोप लगाया है। इन आरोपों की जांच अभी जारी है।

वहीं, IIT बॉम्बे ने जातीय भेदभाव के आरोपों से अलग अपना पक्ष रखा है। संस्थान के अनुसार, छात्र की ओर से उसके SC-ST सेल या प्रशासन के पास ऐसी कोई शिकायत दर्ज होने की जानकारी नहीं थी। इस विरोधाभास के कारण जांच में सामने आने वाले तथ्यों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है।

‘नकल पर डांटना अपने आप में जातिसूचक गाली नहीं’

घटना के बाद कुछ शिक्षाविदों ने यह सवाल उठाया है कि किसी छात्र को परीक्षा में नियमों के उल्लंघन पर रोकना या फटकार लगाना अपने आप में जातीय अपमान की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। उनका तर्क है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में अकादमिक ईमानदारी और परीक्षा अनुशासन बनाए रखना भी आवश्यक है।

हालांकि, इस तर्क का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष छात्र की सुरक्षा और मानसिक स्थिति से जुड़ा है। यही वजह है कि मौजूदा बहस केवल इस बात तक सीमित नहीं है कि परीक्षा नियमों का उल्लंघन हुआ या नहीं, बल्कि यह भी सवाल उठ रहा है कि गंभीर तनाव की स्थिति में संस्थान छात्रों को किस स्तर की काउंसलिंग और सहायता उपलब्ध कराते हैं।

जांच के बीच प्रोफेसर डूला को डीन पद से हटाया गया

साहिल की मौत के बाद IIT बॉम्बे परिसर में छात्रों का विरोध भी सामने आया। 21 सितंबर को संस्थान ने प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला को डीन पद से तत्काल निलंबित करने की घोषणा की। संस्थान ने कहा कि आगे की कार्रवाई जांच के निष्कर्षों के आधार पर की जाएगी।

इससे पहले IIT बॉम्बे ने साहिल की मौत से जुड़े अपने शुरुआती संचार को लेकर भी माफी मांगी और कहा कि घटना से पहले की परिस्थितियों की जांच जारी है। संस्थान ने यह स्पष्ट किया कि जांच पूरी होने से पहले निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

मुंबई क्राइम ब्रांच कर रही है मामले की जांच

मामले की जांच अब मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच के पास है। पुलिस शिकायत में आत्महत्या के लिए उकसाने से जुड़े आरोपों की भी जांच की जा रही है। रिपोर्टों के अनुसार FIR में दो अन्य आरोपियों की पहचान अभी स्पष्ट नहीं की गई है।

इस स्तर पर यह महत्वपूर्ण है कि परिवार के आरोप, संस्थान का पक्ष और जांच एजेंसी के निष्कर्षों को अलग-अलग देखा जाए। किसी आरोप का FIR में दर्ज होना अपने आप में आरोप साबित होने के बराबर नहीं है।

शिक्षाविदों के सामने बड़ा सवाल—अनुशासन या छात्र सहायता?

घटना ने IIT जैसे उच्च दबाव वाले शैक्षणिक संस्थानों में एक व्यापक प्रश्न खड़ा किया है। परीक्षा में नियमों का पालन कराना संस्थानों की जिम्मेदारी है, लेकिन इसके साथ छात्रों को तनाव, असफलता और अनुशासनात्मक परिस्थितियों से निपटने के लिए पर्याप्त सहायता देना भी महत्वपूर्ण है।

IIT मद्रास फैकल्टी एसोसिएशन की ओर से भी ऐसी प्रक्रियाओं की समीक्षा की जरूरत पर जोर दिए जाने की रिपोर्ट सामने आई है, ताकि शैक्षणिक कदाचार से जुड़े मामलों में छात्रों को जरूरत के समय पर्याप्त सहायता और सुरक्षा मिल सके।

‘एक परीक्षा पूरी जिंदगी का पैमाना नहीं’

घटना के बाद कुछ IIT संस्थानों में छात्रों तक सीधे पहुंचने की कोशिश भी की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, IIT खड़गपुर के निदेशक प्रोफेसर सुमन चक्रवर्ती ने छात्रों को परीक्षा को उनकी पूरी पहचान या भविष्य का अंतिम पैमाना नहीं मानने का संदेश दिया।

इस तरह साहिल वाकोडे की मौत के बाद बहस का दायरा परीक्षा में अनुशासन से आगे बढ़कर संस्थागत जवाबदेही, छात्र सहायता, मानसिक दबाव और सामाजिक भेदभाव के आरोपों तक पहुंच गया है। इन सभी पहलुओं पर अंतिम तस्वीर जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।

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