
लखनऊ : गुणार – जय हो, जय हो! कितना स्वच्छ है? कितना सुन्दर है? पूरा वातावरण अनुभूति में उतर रहा है। ये कोयले, गौरैया टोली और ये देखो गुटर गूँ वाले भी। वाह! अद्भुतम ! सब कुछ अप्रतिम!क्षुभागर – क्या भाई! जब देखो, अप्रतिम दार्शनिक पर उतार आते हो। सब कुछ तुम्हारी अनुभूति में ही उतरने लगता है? क्या मतलब है तुम्हारे इस प्रवचन का?गुणार – मतलब क्या नहीं है?
आप ही बता दें। क्षुभागर – मतलब इस तरह नहीं है कि इस प्रवचन से जार, जमीन, जायदाद, मकान, दुकान, गाड़ी, घोड़ा कुछ भी तो नहीं मिलता। क्या करे तुम्हारे प्रवचन का?गुणार – बात तो सही है लेकिन ये बताओ कि पहले अपनी अन्तरात्मा में बैठते हो या मकान-दुकान में?क्षुभागर – क्या मतलब? अन्तरात्मा भी कोई बैठने की जगह है?गुणार – कभी तो अन्दर झाँक लिया करो! अन्दर की बैठनेवाली जगह अपवित्र है। बाहर का कुछ भी उतना सुन्दर नहीं है। और सुनो, बाहर की स्वच्छता अन्दर के आसन पर बैठनेवालो को बहुत प्रिय है, कुदरत की प्रत्येक दिन अन्दर वाले को बहुत प्रिय है।
जहाँ तक बाहरी सफाई की बात है तो उसके भी दोनो फायदे हैं। सफाई रहने से बीमारियाँ नहीं आती और बीमारी नहीं होने से दवाई की जरूरत नहीं पड़ती। मतलब, आपके हिसाब से जो फायदा-शास्त्र का नियम है, उसके अनुसार भी फायदा ही फायदा है।
साफ सफाई घर-घर भाई,
सबसे अच्छी यही कमाई,
मक्खी-मच्छर दूर भगे तो,
नहीं जरूरत पड़े दवाई !
क्षुभागर – चलिए, साफ सफाई की बात तो मान लिए लेकिन ये कोयल और गौरैया जो देखते फिरते हो, इसका क्या मतलब है? सारी जमीन पर कोयल निहारने के लिए जमीन पैसा दोगे तो इमारत कहाँ बनेगी? शहर कहाँ बसेगा? कल-कारखाने कहाँ लगेंगे?गुणार – आपने जो कुछ गिनाया हम भी उन्हें जरुरी समझते हैं लेकिन अन्तर बस दृष्टिकोण का है। कुदरत और भौतिक आवश्यकताओं के बीच सन्तुलन स्थापित करने की जरुरत है। आपको एक वाकया सुनाता हूँ। एक बहुत अमीर आदमी थे लेकिन मतलब केवल अपने से रखते थे। अपना घर तो चकाचक कर लिया रे लेकिन पड़ोस की गन्दगी का कोई माई-बाप नहीं था। हुआ यूँ कि उनके घर एक रिश्ता आया। रिश्ते वाले जितने बाहर से चमकीले थे उतने ही अन्दर से भी थे। जैसा कि चलन है, रिश्तेदारों के लिए परोसे गए भोजन पर मक्खी रानी प्रथम भोग की रस्मात पूरी करने धमक पड़ी। फिर क्या था? रिश्ते वाले तपाक से निकल लिए।
उनके घर एक रिश्ता आया,
थाल सजा कर पिरसा खाया,
जूठी ही पड़ी मक्खी रानी,
रिश्ता झट-पट दूर पराया !
क्षुभागर – ये कोई बात हुई? जहाँ सौ मक्खी के बैठे जाने से क्या होता है? दूसरा प्लेट मंगा लेते, मक्खी वाले को छोटा देते। इतनी नाराजगी अच्छी नहीं होती है। आदमी को सब रखने की आदत डालनी चाहिए।गुणार – ये बात तो बिलकुल पते की है कि आदमी को सब रखने की कला सीखनी चाहिए, उसे अपनी आदत में सुधार करनी चाहिए।क्षुभागर – तो फिर रिश्ते वाले का तुरंत कर भाग जाना कहाँ तक उचित है? उनका उदाहरण तो आप ही न दे रहे थे। क्या कहना चाह रहे थे? बताइये, बताइये! हम भी जानते हैं।गुणार – सब रखने की बात भी सही है और रिश्ते वाले का तुनक के भाग जाना भी उचित है।क्षुभागर – जब दोनों ही उचित हैं तो फिर अनुचित क्या है? हम तो एकदम कन्फ्यूज्ड हो गए हैं। किसी दुविधा में डाल दिए हो?गुणार – इसमें दुविधा क्या है? दोनों विचार के दो सिरे हैं। दुविधा तो तब होती है जब हम दोनों सिरो को मिला देते हैं।क्षुभागर – मतलब नहीं समझ पा रहे।
गुणार – समझना क्या है? मतलब बिल्कुल स्पष्ट है। जो चीज़ें हमारी अवधारणा तक को दूषित कर देती हैं वो तनिक भी सहनीय नहीं होती हैं। लेकिन जहाँ भौतिक सुखों के साधनों के संग्रहण की बात हो, जहाँ आपसी सम्बन्धों की बात हो वहाँ सब रखने की जरूरत होती है। जैसे रिश्ते वाले दृष्टांत पर गौर करें तो स्पष्ट होता है कि मेजबान महोदय ने गन्दगी को सहन करने की आदत तो पाल रखी थी जो मेहमान को अच्छी नहीं लगी। इस दृष्टांत में मेहमान का मक्खी के आने को सहन नहीं करना उनके उचित विचार का सूचक, उनके भीतर से स्वच्छ होने का प्रतीक है।
मेरा स्पष्ट मानना है कि-
जिनके स्वच्छ सुवास न भावे
उनके घर कोई पास न जावे !!
क्षुभागर – कोई भाई! जिसके घर रिश्ता आया था उसका घर-द्वार कभी देखे हैं? एकदम आलीशान महल, चकाचक रंगरोगन ! गाड़ी-घोड़ा लाजवाब ! क्या कमी है? जब देखो के ही तो मेहमान उनके घर आये थे उनके पास आये थे। गुणागार – क्या कमी पूछ रहे हैं? कमी ही कमी है। जो आप बता रहे हैं वो सब भौतिक वस्तुएँ हैं, सुख का साधन बन सकती हैं, स्वतः सुख नहीं है। सुख तो वैचारिक सम्पन्नता से आती है, वैचारिक उन्नति का हो जाना ही सुख है। गन्दगी वाले बाहर की हो या अन्दर की, विपन्नता लाने की वजह बनती है। क्षणिक भौतिक सुखों के साधन को सम्पन्नता कह देना बिल्कुल अनुचित है।

क्षुभागर – तो फिर किया क्या जाये? कोई सुनने को थोड़े न तैयार बैठा हुआ है? अकेले क्या कर लेंगे?
गुणार – अकेले कुछ नहीं करना है। पहले तो अपने ही विचारों का शोधन करना। भौतिक स्वच्छता वैचारिक स्वच्छता के पीछे-पीछे चलती है। जब स्वयं में ऐसी स्वच्छता के भाव की अनुभूति होने लगे तो फिर ऐसे विचार को स्वस्थ विचार कहेंगे। जहाँ कहीं भी ऐसे विचार का प्रदर्शन होता है, शिक्षा और जागरण का परिणाम होता है। ऐसे विचार के अपमान को भारत के गौरव से जोड़कर देखा जाना और उनको जन-जन तक पहुँचा देना है, भौतिक स्वच्छता भी दौड़ी-दौड़ी पीछे से आ जाएगी।जिस धरती पे नगर इगर थे, सभ्य हड़प्पा बसे सुघड़ थे,
वो भारत एक देश हमारा, दुनिया भर में गजब असर से !
जिस धरती पे नगर इगर थे,
सभ्य हड़प्पा बसे सुघड़ थे,
उसका मान बढ़ाते जाओ,
दुनिया जाने गजब असर थे!









