“इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि पत्नी का गुजारा-भत्ता उसका कानूनी अधिकार है। कोर्ट ने पति को हर महीने 20 हजार रुपये भरण-पोषण देने का फैमिली कोर्ट का आदेश बरकरार रखा।“
प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पत्नी के भरण-पोषण को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि आर्थिक तंगी और बेबसी में जीवन बिताने के लिए किसी पत्नी को मजबूर नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि पत्नी को सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है। ऐसे में उसे गुजारा-भत्ता से वंचित करना उसके संवैधानिक अधिकारों के विपरीत होगा।
न्यायमूर्ति अचल सचदेव की एकलपीठ ने देवांश की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। याची ने गौतमबुद्ध नगर की फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे अपनी पत्नी को हर महीने 20 हजार रुपये गुजारा-भत्ता देने का निर्देश दिया गया था। हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश में किसी तरह की कानूनी या तथ्यात्मक त्रुटि नहीं पाई और उसे बरकरार रखा।
भरण-पोषण पति की ओर से कोई दान नहीं
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि पत्नी को दिया जाने वाला भरण-पोषण पति की ओर से कोई दान या उपकार नहीं है। यह पत्नी का कानूनी अधिकार है। अदालत ने कहा कि विवाह के बाद यदि पत्नी ऐसी स्थिति में पहुंच जाती है, जहां उसके पास खुद के जीवन-यापन के पर्याप्त साधन नहीं हैं, तो कानून के तहत उसके भरण-पोषण की जिम्मेदारी से पति बच नहीं सकता।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भरण-पोषण से जुड़े कानूनी प्रावधानों का उद्देश्य केवल आर्थिक सहायता देना नहीं है, बल्कि महिला को सम्मान और गरिमा के साथ जीवन जीने का अवसर सुनिश्चित करना भी है।
पत्नी ने दहेज उत्पीड़न का लगाया था आरोप
मामले के अनुसार, दोनों की शादी जुलाई 2017 में हिंदू रीति-रिवाज से हुई थी। पत्नी का आरोप था कि शादी के बाद ससुराल पक्ष की ओर से दहेज की मांग को लेकर उसे प्रताड़ित किया जाने लगा। उसने आरोप लगाया कि उससे स्विफ्ट कार और 100 वर्ग गज के प्लाट की मांग की गई थी।
पत्नी के मुताबिक, 30 मार्च 2018 को पति और उसके परिवार के सदस्यों ने उसके साथ मारपीट की और उसे घर में बंद कर दिया। इसके बाद उसने पुलिस को सूचना दी और 2 अप्रैल 2018 से वह अपने मायके में रह रही है।
पत्नी ने कहा- अपनी कोई आय नहीं, पिता पर निर्भर
पत्नी ने अदालत के समक्ष कहा था कि उसकी अपनी कोई आय नहीं है और वह अपने वृद्ध पिता पर निर्भर है। उसने भरण-पोषण के लिए 30 हजार रुपये प्रतिमाह की मांग की थी।
वहीं, पति के बारे में अदालत को बताया गया कि वह साफ्टवेयर इंजीनियर है और उसकी आय करीब 70 हजार रुपये प्रतिमाह है। इसके अलावा पति और उसके परिवार के पास कई संपत्तियां और व्यवसाय भी हैं, जिनसे करीब दो लाख रुपये प्रतिमाह की आय होने का दावा किया गया।
फैमिली कोर्ट ने उपलब्ध दस्तावेजों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद पत्नी को 20 हजार रुपये प्रतिमाह गुजारा-भत्ता देने का आदेश दिया था।
पति से अलग रहने का पर्याप्त कारण पाया
हाई कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने मामले से जुड़े तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला था कि पत्नी के पास पति से अलग रहने का पर्याप्त कारण है। हाई कोर्ट को फैमिली कोर्ट के इस निष्कर्ष में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं मिला।
अदालत ने इसी आधार पर पति की याचिका खारिज कर दी और 20 हजार रुपये मासिक भरण-पोषण देने के आदेश को बरकरार रखा।
अनुच्छेद 21 में सम्मान से जीवन का अधिकार
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में संविधान के अनुच्छेद 15(3), अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 39 का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि भरण-पोषण से संबंधित कानूनी प्रावधान सामाजिक न्याय की संवैधानिक भावना को लागू करते हैं।
अदालत के अनुसार, संविधान के अनुच्छेद 21 में जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार शामिल है। इस अधिकार का अर्थ केवल जीवित रहना नहीं, बल्कि सम्मान और गरिमा के साथ जीवन जीना भी है। इसलिए पत्नी को ऐसी आर्थिक स्थिति में नहीं छोड़ा जा सकता, जहां वह बुनियादी जरूरतों के लिए भी दूसरों पर निर्भर रहने को मजबूर हो।
हाई कोर्ट के फैसले का संदेश
इलाहाबाद हाई कोर्ट की यह टिप्पणी वैवाहिक विवादों में भरण-पोषण के अधिकार को लेकर महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अदालत ने साफ किया कि गुजारा-भत्ता किसी महिला पर किया गया एहसान नहीं, बल्कि कानून द्वारा संरक्षित अधिकार है। हालांकि, भरण-पोषण की राशि तय करते समय दोनों पक्षों की आय, आर्थिक स्थिति, जरूरतों और मामले के अन्य तथ्यों पर विचार किया जाता है।
इस मामले में हाई कोर्ट ने उपलब्ध तथ्यों के आधार पर फैमिली कोर्ट द्वारा तय 20 हजार रुपये प्रतिमाह की राशि को उचित माना और पति की चुनौती को खारिज कर दिया।





