
“महाराष्ट्र सरकार ने कर्नाटक के साथ लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट से 2004 में दायर मुकदमे पर जल्द सुनवाई की मांग की है। महाराष्ट्र का दावा है कि कर्नाटक में प्रशासित 865 मराठी भाषी गांव और कस्बे भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के सिद्धांत के विपरीत हैं।“
नई दिल्ली: महाराष्ट्र सरकार ने कर्नाटक के साथ लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद के मामले में सुप्रीम कोर्ट से जल्द सुनवाई की मांग की है। महाराष्ट्र ने वर्ष 2004 में दायर अपने मुकदमे की सुनवाई शीघ्र शुरू करने का अनुरोध किया है। विवाद मुख्य रूप से कर्नाटक में प्रशासित मराठी भाषी गांवों और कस्बों को लेकर है। महाराष्ट्र का दावा है कि बेलगावी (बेलगाम), कारवार और निपाणी समेत 865 मराठी भाषी गांव और कस्बे कर्नाटक के प्रशासन में हैं।
सुप्रीम कोर्ट में महाराष्ट्र ने क्या कहा
महाराष्ट्र की ओर से पेश वकील ने मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष मामले को जल्द सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया। वकील ने कहा कि मामले में दोनों पक्षों की दलीलें और आवश्यक pleadings पूरी हो चुकी हैं, इसलिए अब इस पर सुनवाई शुरू की जा सकती है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं। महाराष्ट्र के वकील ने अदालत से आग्रह किया कि मामले को अब सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए।
इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि वह मामले की जांच करेंगे। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि वह अभी मामले की सूचीबद्धता को लेकर कोई आश्वासन नहीं दे सकते।
महाराष्ट्र का भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का तर्क
महाराष्ट्र सरकार का कहना है कि कर्नाटक में मराठी भाषी आबादी वाले क्षेत्रों का प्रशासन भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के मूल सिद्धांत के अनुरूप नहीं है। सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र की ओर से 565 मराठी भाषी गांवों का भी उल्लेख किया गया।
महाराष्ट्र का तर्क है कि जब राज्यों की सीमाओं का पुनर्गठन मुख्य रूप से भाषाई आधार पर किया गया था, तब मराठी भाषी क्षेत्रों को कर्नाटक में शामिल किए जाने का मुद्दा विचारणीय है। इसी आधार पर महाराष्ट्र इन क्षेत्रों पर अपना दावा करता रहा है।
2004 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था मामला
महाराष्ट्र ने वर्ष 2004 में सुप्रीम कोर्ट में मूल वाद दायर कर कर्नाटक द्वारा इन क्षेत्रों के प्रशासन और 1956 के संबंधित कानून के प्रावधानों को चुनौती दी थी। इसके बाद से दोनों राज्यों के बीच यह सीमा विवाद लंबे समय से कानूनी और राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है।
महाराष्ट्र का कहना है कि कर्नाटक में प्रशासित मराठी भाषी क्षेत्रों को महाराष्ट्र में शामिल किया जाना चाहिए। वहीं, कर्नाटक इन क्षेत्रों पर अपने प्रशासनिक अधिकार को बनाए रखता है।
1956 के कानून के बाद बदली थीं राज्यों की सीमाएं
राज्यों के पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के तहत देश में राज्यों की सीमाओं का बड़े पैमाने पर पुनर्गठन किया गया था। इस दौरान भाषाई आधार को प्रमुख मानदंडों में शामिल किया गया था। इसी पुनर्गठन के तहत तत्कालीन मैसूर राज्य, जिसे अब कर्नाटक के नाम से जाना जाता है, में बेलगावी को शामिल किया गया था।
बेलगावी को तत्कालीन मैसूर राज्य में शामिल किए जाने के पीछे उस क्षेत्र में कन्नड़ भाषी आबादी की बहुलता को प्रमुख आधार माना गया था। वहीं, आसपास के मराठी भाषी क्षेत्र महाराष्ट्र में बने रहे।
बेलगावी समेत कई क्षेत्र विवाद के केंद्र में
महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच सीमा विवाद में बेलगावी सबसे प्रमुख क्षेत्रों में से एक है। इसके अलावा कारवार और निपाणी समेत कई सीमावर्ती क्षेत्रों को लेकर भी दोनों राज्यों के बीच लंबे समय से मतभेद हैं।
महाराष्ट्र इन क्षेत्रों में मराठी भाषी आबादी का हवाला देते हुए अपना दावा करता रहा है। दूसरी ओर, कर्नाटक इन इलाकों को अपने राज्य का हिस्सा मानता है। विवाद के कारण समय-समय पर दोनों राज्यों के बीच राजनीतिक बयानबाजी भी तेज होती रही है।
अब सुप्रीम कोर्ट की सूचीबद्धता पर नजर
महाराष्ट्र की ओर से जल्द सुनवाई की मांग के बाद अब इस मामले की सुप्रीम कोर्ट में सूचीबद्धता को लेकर नजर बनी हुई है। मुख्य न्यायाधीश ने मामले की जांच करने की बात कही है, लेकिन फिलहाल सुनवाई के लिए निश्चित तारीख तय नहीं हुई है।
दोनों राज्यों के बीच दशकों पुराने इस सीमा विवाद का समाधान संवैधानिक और कानूनी स्तर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से होने की उम्मीद है। महाराष्ट्र की ताजा मांग ने इस लंबे समय से लंबित मामले को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है।
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