
“मानसून सितंबर की शुरुआत में फिर सक्रिय हो गया है। हिमाचल, उत्तराखंड, बिहार, ओडिशा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में भारी बारिश, बाढ़ और भूस्खलन का खतरा है। हिमालयी क्षेत्रों में GLOF की आशंका भी बढ़ी है।“
नई दिल्ली। सितंबर की शुरुआत के साथ देश के कई हिस्सों में मानसून ने एक बार फिर जोर पकड़ लिया है। मौसम विभाग के अनुसार उत्तर-पश्चिम, पूर्वी, मध्य और पूर्वोत्तर भारत के कई इलाकों में अगले कुछ दिनों तक बारिश का दौर जारी रहने की संभावना है। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, ओडिशा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में भारी बारिश के कारण बाढ़ और भूस्खलन जैसी स्थितियां बनने का खतरा है।
नेपाल में आई बाढ़ के बाद भारत के मैदानी राज्यों, विशेषकर बिहार और उत्तर प्रदेश में नदियों के जलस्तर पर भी नजर रखी जा रही है। वहीं, हिमालयी राज्यों में भारी बारिश के साथ ग्लेशियर झीलों के आकार में वृद्धि और उनके अचानक फटने से आने वाली बाढ़ यानी ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) का खतरा भी चिंता बढ़ा रहा है।
हिमाचल में चार दिन बारिश का पूर्वानुमान
हिमाचल प्रदेश और राजधानी शिमला में हल्की से मध्यम बारिश का दौर चार सितंबर तक जारी रहने की संभावना है। मौसम विभाग ने अगले चार दिनों में भारी बारिश की आशंका वाले जिलों के लिए येलो अलर्ट जारी किया है।
हिमाचल में लगातार बारिश और जलस्तर बढ़ने के बीच ग्लेशियर झीलों पर भी निगरानी बढ़ा दी गई है। किन्नौर की सांगला ग्लेशियर झील में करीब 15.27 लाख घन मीटर पानी बताया गया है और यह लगभग 15.73 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली है। पिछले कुछ वर्षों में झील के आकार में वृद्धि दर्ज की गई है। यदि झील अचानक फटती है तो निचले इलाकों के साथ जेएसडब्ल्यू बास्पा हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट जैसे महत्वपूर्ण ढांचों के लिए खतरा पैदा हो सकता है।
लाहौल-स्पीति की घेपांग घाट झील का आकार भी 33 वर्षों में 178 प्रतिशत बढ़ने की बात सामने आई है। इससे आसपास और निचले इलाकों में अचानक बाढ़ का जोखिम बढ़ गया है।
झीलों की रियल टाइम मॉनिटरिंग
संभावित आपदा से निपटने के लिए प्रशासन ने सी-डैक की मदद से ग्लेशियर झीलों की निगरानी और अर्ली वार्निंग सिस्टम को सक्रिय किया है। इसका उद्देश्य झीलों में होने वाले बदलावों की समय रहते जानकारी हासिल करना और खतरा बढ़ने की स्थिति में प्रभावित क्षेत्रों के लोगों को चेतावनी देना है।
इस मानसून सीजन में हिमाचल प्रदेश में अब तक सामान्य से करीब 10 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। हालांकि कुछ जिलों में सामान्य से अधिक वर्षा हुई है। हमीरपुर में सामान्य से 35 प्रतिशत अधिक, शिमला में 14 प्रतिशत अधिक और बिलासपुर में तीन प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की गई है। वहीं लाहौल-स्पीति में सामान्य से 59 प्रतिशत कम, मंडी में 18 प्रतिशत कम और कांगड़ा में छह प्रतिशत कम बारिश हुई है।
उत्तराखंड में भूस्खलन से 80 से अधिक सड़कें बंद
उत्तराखंड में भारी बारिश के कारण जनजीवन प्रभावित हुआ है। देहरादून और टिहरी के लिए ऑरेंज अलर्ट जारी किया गया है। बारिश के चलते कई स्थानों पर भूस्खलन हुआ है, जिससे सड़क मार्ग बाधित हैं। राज्य में 80 से अधिक सड़कों के बंद होने की जानकारी सामने आई है।
मौसम की स्थिति को देखते हुए स्कूलों में कक्षा एक से 12 तक के विद्यार्थियों की एक दिन की छुट्टी घोषित की गई है। देहरादून जिले में आंगनवाड़ी केंद्र भी बंद रखे गए हैं। हरिद्वार के कुछ हिस्सों में जलभराव के कारण लोगों को आवागमन में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
प्रशासन ने सभी संबंधित विभागों को चौबीसों घंटे सतर्क रहने के निर्देश दिए हैं। भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों में लोगों को अनावश्यक यात्रा से बचने की सलाह दी गई है।
ओडिशा में भारी बारिश का अलर्ट
ओडिशा में भी मानसून सक्रिय बना हुआ है। राज्य में सामान्य से काफी अधिक बारिश दर्ज की गई है। कम दबाव का क्षेत्र मजबूत होने के कारण मौसम विभाग ने तीन दिनों तक भारी बारिश का अलर्ट जारी किया है।
कुछ इलाकों में भारी बारिश के साथ गरज-चमक और तेज हवाएं चलने की संभावना है। एक सितंबर को हवा की गति 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटा रहने और झोंकों के साथ 50 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंचने की आशंका जताई गई है। मौसम को देखते हुए लोगों को सावधानी बरतने और खराब मौसम के दौरान घर के भीतर रहने की सलाह दी गई है।
मध्य प्रदेश और बिहार में भी बाढ़ का खतरा
मध्य प्रदेश में लगातार बारिश के कारण कई जिलों में जलस्तर बढ़ा है। कुछ बांधों के ओवरफ्लो होने और गांवों में बाढ़ जैसी स्थिति बनने से जनजीवन प्रभावित हुआ है। कई क्षेत्रों में एहतियात के तौर पर स्कूल भी बंद किए गए हैं।
बिहार में भी नदियों का जलस्तर बढ़ने के कारण कई जिलों में चिंता बढ़ी है। 14 जिलों के लिए ऑरेंज अलर्ट जारी किया गया है। भारी बारिश का दौर पूरे सप्ताह जारी रहने की संभावना है। नदियों में बढ़ते पानी के कारण सड़क और अन्य संपर्क मार्ग प्रभावित हो सकते हैं।
नेपाल की बाढ़ का बिहार पर सीधा असर
नेपाल से निकलने वाली कोसी, गंडक और बागमती जैसी नदियां बिहार से होकर गुजरती हैं। नेपाल के पहाड़ी इलाकों में अत्यधिक बारिश, भूस्खलन या अचानक पानी छोड़े जाने की स्थिति में इन नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ सकता है।
बिहार का बड़ा हिस्सा मैदानी क्षेत्र में होने के कारण अत्यधिक पानी आने पर उसकी निकासी चुनौती बन जाती है। यही वजह है कि नेपाल में होने वाली भारी बारिश का असर कई बार बिहार के सीमावर्ती और निचले इलाकों तक पहुंच जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों के बीच बारिश, नदियों के जलस्तर और जलाशयों से पानी छोड़े जाने से जुड़ी सूचनाओं का त्वरित आदान-प्रदान जरूरी है।
बाढ़ से पहले तैयारी पर जोर
पर्यावरण विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि बिहार को बाढ़ आने के बाद प्रतिक्रिया देने के बजाय पहले से तैयारी करनी चाहिए। इसके लिए तटबंधों के कमजोर हिस्सों की नियमित जांच, सुरक्षित निकासी मार्ग और बाढ़ राहत शिविरों को पहले से तैयार रखना जरूरी है।
बाढ़ की चेतावनी केवल प्रशासनिक अधिकारियों तक सीमित न रहकर सीधे संवेदनशील गांवों तक पहुंचनी चाहिए। इसके लिए सायरन, लाउडस्पीकर, एसएमएस, पंचायतों और स्थानीय स्वयंसेवकों की मदद ली जा सकती है। समय रहते चेतावनी मिलने से ग्रामीण सुरक्षित स्थानों पर पहुंच सकते हैं।
उत्तर प्रदेश में भी बढ़ रहा नदियों का जलस्तर
बिहार और मध्य प्रदेश में लगातार हो रही बारिश का असर उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में भी दिखाई दे सकता है। इन राज्यों से होकर आने वाली नदियों में पानी बढ़ने पर उत्तर प्रदेश के निचले इलाकों में बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है।
उत्तर प्रदेश के साथ बिहार और अन्य मैदानी राज्यों में प्रशासन को नदियों के जलस्तर और बांधों से पानी छोड़े जाने की स्थिति पर लगातार नजर रखने की जरूरत है।
किन राज्यों पर नेपाल के मौसम का असर पड़ सकता है?
विशेषज्ञों के अनुसार नेपाल में भारी बारिश का सबसे अधिक असर बिहार और उत्तर प्रदेश में नदियों के बढ़ते जलस्तर के रूप में दिखाई दे सकता है। इसके अलावा सिक्किम, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल और असम में अचानक बाढ़, भूस्खलन और नदियों में तेज बहाव जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।
नेपाल और भारत के हिमालयी क्षेत्रों में होने वाली बारिश का प्रभाव केवल पहाड़ी इलाकों तक सीमित नहीं रहता। पहाड़ों से निकलने वाली नदियां मैदानी क्षेत्रों में पहुंचकर बड़े भूभाग को प्रभावित कर सकती हैं।
जलवायु परिवर्तन भी बढ़ा रहा जोखिम
बारिश और बाढ़ की बढ़ती घटनाओं के पीछे कई प्राकृतिक और मानवीय कारण बताए जा रहे हैं। इनमें जलवायु परिवर्तन, कम समय में अत्यधिक बारिश, ग्लेशियरों और बर्फ का तेजी से पिघलना, भूस्खलन, नदियों में तलछट का जमाव, वनों की कटाई और संवेदनशील इलाकों में तेजी से बढ़ता निर्माण प्रमुख हैं।
हिमालयी क्षेत्र में तापमान बढ़ने से ग्लेशियरों के पिघलने की गति प्रभावित हो रही है। इसके साथ ही बर्फबारी के बदलते पैटर्न, ब्लैक कार्बन का जमाव और बारिश के स्वरूप में बदलाव ग्लेशियर झीलों के विस्तार का कारण बन सकते हैं।
ग्लेशियर झीलों के फटने का खतरा
ग्लेशियरों के पिघलने से उनके आसपास बनने वाली झीलों में पानी की मात्रा बढ़ सकती है। यदि किसी झील की प्राकृतिक रोकथाम कमजोर होती है और अचानक पानी बाहर निकलता है तो तेज गति से नीचे की ओर आने वाली बाढ़ बड़े क्षेत्र को प्रभावित कर सकती है। इसे ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF कहा जाता है।
हिमालयी राज्यों में ऐसे खतरे को देखते हुए ग्लेशियर झीलों की निगरानी और समय रहते चेतावनी देने वाली व्यवस्था को मजबूत करना महत्वपूर्ण है।
उत्तर-पश्चिम से दक्षिण तक बारिश का असर
मौसम विभाग के अनुसार उत्तर-पश्चिम भारत में हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली और पंजाब में इस सप्ताह बारिश का दौर देखने को मिल सकता है। मध्य भारत में भी मौसम प्रणाली सक्रिय रहने की संभावना है। छत्तीसगढ़, पूर्वी मध्य प्रदेश और विदर्भ में बारिश होने का अनुमान है।
पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में भी कई दिनों तक मौसम सक्रिय रह सकता है। अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा में बारिश की संभावना है।
पश्चिम और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में भी पांच सितंबर तक छिटपुट बारिश का दौर जारी रह सकता है। तटीय आंध्र प्रदेश, यनम, उत्तरी आंतरिक कर्नाटक, तमिलनाडु और तेलंगाना में बारिश होने की संभावना है। वहीं पश्चिमी भारत के कोंकण, गोवा और मध्य महाराष्ट्र में भी इस सप्ताह बारिश हो सकती है।
बंगाल की खाड़ी में बनी मौसम प्रणाली से बढ़ी सक्रियता
पूर्वी भारत में मानसून की सक्रियता बढ़ी हुई है। सोमवार को कई इलाकों में गरज-चमक के साथ भारी बारिश हुई। बंगाल की खाड़ी से विकसित कम दबाव का क्षेत्र मैदानी इलाकों की ओर बढ़ा है।
मानसून की रेखा पूर्वी और मध्य भारत के हिस्सों में सक्रिय रहने से पूर्वी, मध्य और पश्चिमी क्षेत्रों में बारिश का दौर तेज हुआ है। मौसम विभाग की चेतावनियों को देखते हुए संवेदनशील राज्यों में प्रशासन को बाढ़, भूस्खलन और जलभराव से निपटने के लिए तैयार रहने की जरूरत है।
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