“वाराणसी में निर्जला एकादशी के अवसर पर लाखों श्रद्धालुओं ने गंगा नदी में स्नान कर दान-पुण्य किया। दशाश्वमेध घाट समेत प्रमुख घाटों पर भारी भीड़ उमड़ी, जबकि प्रशासन ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए।“
वाराणसी, 25 जून। धर्म और अध्यात्म की नगरी काशी में गुरुवार को निर्जला एकादशी के पावन अवसर पर आस्था का अभूतपूर्व जनसैलाब उमड़ पड़ा। लाखों श्रद्धालुओं ने पवित्र गंगा नदी में स्नान कर दान-पुण्य किया और भगवान विष्णु की आराधना कर परिवार की सुख-समृद्धि और कल्याण की कामना की।
भोर होते ही श्रद्धालु गंगा घाटों की ओर उमड़ पड़े। विशेष रूप से दशाश्वमेध घाट, राजेंद्र प्रसाद घाट, शीतला घाट, अहिल्याबाई घाट, पंचगंगा घाट और सामने घाट पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिली। गौदोलिया से लेकर दशाश्वमेध घाट तक पूरा क्षेत्र मेले में तब्दील नजर आया।
जिला प्रशासन ने गंगा घाटों से लेकर काशी विश्वनाथ धाम तक सुरक्षा और यातायात व्यवस्था के व्यापक इंतजाम किए थे। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए थे ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।
शीतला घाट के तीर्थ पुरोहित दिनेश उपाध्याय ने बताया कि सनातन धर्म में निर्जला एकादशी को वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण एकादशी माना जाता है। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है और मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से व्रत रखने पर पूरे वर्ष की सभी एकादशियों का पुण्य फल प्राप्त होता है।
उन्होंने बताया कि एकादशी के दिन चावल का सेवन और दान वर्जित माना जाता है। श्रद्धालु फल, आम, केला तथा जल से भरी गगरी का दान करते हैं। ज्येष्ठ मास की इस एकादशी को भीम एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार निर्जला एकादशी का व्रत मन को संयमित करने और आत्मिक ऊर्जा प्रदान करने वाला माना जाता है। इस दिन तामसिक भोजन, परनिंदा और किसी भी प्रकार के नकारात्मक कार्यों से दूर रहने की सलाह दी जाती है।
पौराणिक मान्यता है कि श्रद्धा और भक्ति के साथ निर्जला एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को करोड़ों गायों के दान के समान पुण्य प्राप्त होता है तथा समस्त पापों का नाश होता है। इसी आस्था और विश्वास के साथ देशभर से आए श्रद्धालुओं ने काशी में गंगा स्नान और भगवान विष्णु की आराधना कर आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव किया।









