Diwali 2026: आखिर क्यों मनाई जाती है दिवाली? जानिए 14 धार्मिक मान्यताएं और मुगल बादशाहों के दौर में कैसे मनता था जश्न-ए-चरागां

Diwali 2026: दिवाली को रोशनी, खुशियों और नई शुरुआत का त्योहार माना जाता है। आमतौर पर लोग इसे भगवान राम के 14 साल के वनवास के बाद अयोध्या लौटने की खुशी में मनाया जाने वाला पर्व मानते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दिवाली मनाने के पीछे सिर्फ एक नहीं, बल्कि कई धार्मिक मान्यताएं और ऐतिहासिक परंपराएं जुड़ी हुई हैं? जैन धर्म, सिख धर्म, बौद्ध परंपराओं और भारतीय इतिहास में भी इस दिन का खास महत्व बताया गया है। यहां तक कि मुगल बादशाहों के दौर में भी दिवाली बड़े उत्साह से मनाई जाती थी। उस समय इसे ‘जश्न-ए-चरागां’ यानी रोशनी का उत्सव कहा जाता था।

दिवाली क्यों मनाई जाती है? जानिए इससे जुड़ी 14 मान्यताएं

1. भगवान राम की अयोध्या वापसी

दिवाली से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध मान्यता भगवान राम के अयोध्या लौटने की है। मान्यता है कि 14 साल का वनवास पूरा करने और रावण पर विजय पाने के बाद जब भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण अयोध्या पहुंचे, तो नगरवासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया। तभी से दिवाली पर दीप जलाने की परंपरा चली आ रही है।

2. भगवान विष्णु और राजा बलि की कथा

एक धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी थी। इसके बाद राजा बलि को पाताल लोक का शासन सौंपा गया। कुछ परंपराओं में इस प्रसंग को भी दीपावली से जोड़कर देखा जाता है।

3. भगवान नरसिंह ने किया हिरण्यकश्यप का अंत

पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार लेकर भक्त प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यप का वध किया था। इस घटना को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। कुछ धार्मिक परंपराएं इसे भी दीपोत्सव से जोड़ती हैं।

4. समुद्र मंथन से मां लक्ष्मी का प्राकट्य

पौराणिक मान्यता के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान मां लक्ष्मी प्रकट हुई थीं। इसी वजह से दिवाली के दिन मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने पर घर में सुख-समृद्धि आती है।

5. भगवान कृष्ण ने नरकासुर का किया वध

एक अन्य मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर नाम के अत्याचारी राक्षस का वध किया था। यह घटना दिवाली से एक दिन पहले नरक चतुर्दशी से जुड़ी मानी जाती है। इस दिन को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है।

6. मां काली और भगवान शिव से जुड़ी कथा

कुछ धार्मिक परंपराओं में दिवाली का संबंध मां काली की पूजा से भी बताया जाता है। मान्यता है कि राक्षसों का संहार करने के बाद मां काली का क्रोध शांत करने के लिए भगवान शिव उनके सामने लेट गए थे। यह कथा शक्ति और शिव के संबंध को दर्शाती है।

7. भगवान महावीर का निर्वाण दिवस

जैन धर्म में दिवाली का विशेष महत्व है। जैन परंपरा के अनुसार, इसी दिन भगवान महावीर ने पावापुरी में निर्वाण प्राप्त किया था। जैन समुदाय इस दिन दीप जलाकर उनके ज्ञान और उपदेशों को याद करता है।

8. बौद्ध परंपराओं में दीपोत्सव

कुछ बौद्ध परंपराओं और क्षेत्रीय मान्यताओं में भी दीप जलाने के उत्सव का उल्लेख मिलता है। हालांकि, दिवाली को बौद्ध धर्म का सार्वभौमिक प्रमुख पर्व नहीं माना जाता। अलग-अलग क्षेत्रों में इसकी परंपराएं अलग हो सकती हैं।

9. सम्राट विक्रमादित्य से जुड़ी मान्यता

कुछ ऐतिहासिक और लोकमान्यताओं में दिवाली का संबंध उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के राज्याभिषेक से भी जोड़ा जाता है। हालांकि, इस दावे को लेकर इतिहासकारों के बीच एकमत प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

10. विक्रम संवत से जुड़ी परंपरा

भारतीय परंपरा में दिवाली के आसपास नए वर्ष और नए लेखा-जोखा की शुरुआत का भी महत्व है। कुछ मान्यताएं इसे विक्रम संवत की परंपरा से जोड़ती हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में हिंदू नववर्ष और व्यापारिक वर्ष की शुरुआत अलग-अलग तिथियों पर होती है।

11. स्वर्ण मंदिर से जुड़ा ऐतिहासिक प्रसंग

सिख इतिहास में अमृतसर और श्री हरमंदिर साहिब यानी स्वर्ण मंदिर का विशेष महत्व है। 1577 में अमृतसर की स्थापना से जुड़ी परंपराएं दिवाली के समय के उत्सवों से भी जोड़ी जाती हैं। हालांकि, इस प्रसंग की ऐतिहासिक तिथियों और विवरणों को अलग-अलग स्रोतों में अलग तरह से बताया गया है।

12. गुरु हरगोबिंद साहिब की रिहाई और बंदी छोड़ दिवस

सिख धर्म में दिवाली के दिन बंदी छोड़ दिवस मनाया जाता है। सिख परंपरा के अनुसार, छठे गुरु श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी ग्वालियर किले से रिहा हुए थे और उनके साथ कई अन्य राजाओं को भी मुक्ति मिली थी। इस अवसर को सिख समुदाय बड़े उत्साह से मनाता है।

13. स्वामी दयानंद सरस्वती का निर्वाण

आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती का निधन भी दीपावली के दिन हुआ था। इसलिए आर्य समाज के अनुयायियों के लिए यह दिन उनके विचारों और समाज सुधार के कार्यों को याद करने का अवसर भी है।

14. नेपाल संवत का नया साल

नेपाल में दिवाली के आसपास नेपाल संवत के नए वर्ष की शुरुआत का उत्सव भी मनाया जाता है। इस अवसर पर लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं और नई शुरुआत का स्वागत करते हैं।

मुगल बादशाहों के दौर में भी मनाई जाती थी दिवाली

दिवाली सिर्फ धार्मिक ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और इतिहास का भी अहम हिस्सा रही है। मुगल शासन के दौरान भी इस त्योहार को शाही अंदाज में मनाए जाने के उल्लेख मिलते हैं। उस दौर में दिवाली को ‘जश्न-ए-चरागां’ यानी दीपों का उत्सव कहा जाता था।

ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, मुगल दरबार में दिवाली के अवसर पर रोशनी और सजावट की जाती थी। बादशाह अकबर के समय से लेकर बाद के मुगल शासकों के दौर तक इस त्योहार के आयोजन का जिक्र मिलता है। शाही महलों और किलों को दीपों से सजाया जाता था। मिठाइयां बांटी जाती थीं और आतिशबाजी भी होती थी।

शाहजहां के दौर में लाल किले में दिवाली के भव्य आयोजन का उल्लेख मिलता है। वहीं, अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के समय तक भी दिल्ली में दिवाली मनाने की परंपरा जारी रही। इस तरह दिवाली अलग-अलग समुदायों और सांस्कृतिक परंपराओं को जोड़ने वाले उत्सव के रूप में भी दिखाई देती है।

दिवाली का असली संदेश क्या है?

दिवाली के पीछे जुड़ी अलग-अलग कथाएं और परंपराएं हमें एक ही संदेश देती हैं—अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ना, बुराई पर अच्छाई की जीत और जीवन में नई उम्मीदों का स्वागत करना। यही वजह है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में लोग इसे अपने-अपने धार्मिक और सांस्कृतिक तरीकों से मनाते हैं।

कुल मिलाकर, दिवाली केवल दीप जलाने या मिठाइयां बांटने का त्योहार नहीं है। यह भारत की विविध धार्मिक मान्यताओं, इतिहास और सांस्कृतिक परंपराओं को एक साथ जोड़ने वाला पर्व है।

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