“UN में भारत ने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता का मुद्दा उठाया। भाविका मंगलानंदन ने कारगिल युद्ध और आतंकवादियों के अंतिम संस्कार पर भी सवाल किए।“
न्यूयॉर्क। संयुक्त राष्ट्र में भारत ने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के साथ कथित भेदभाव और उनके अधिकारों की सुरक्षा का मुद्दा उठाते हुए इस्लामाबाद की आलोचना की। भारत की ओर से कहा गया कि जो देश अपने यहां कमजोर समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पा रहा है, उसे भारत को धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर उपदेश देने से पहले अपने रिकॉर्ड पर ध्यान देना चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन की प्रथम सचिव भाविका मंगलानंदन ने धर्म या विश्वास की स्वतंत्रता से संबंधित एक संवाद के दौरान ये टिप्पणियां कीं। यह चर्चा असाधारण परिस्थितियों में अंतिम संस्कार के अधिकारों से संबंधित विशेष प्रतिवेदक की रिपोर्ट के संदर्भ में हुई थी। भारत ने रिपोर्ट में कोविड-19 महामारी के दौरान धार्मिक भेदभाव के आकलन और आतंकवादियों के अंतिम संस्कार के अधिकारों को लेकर प्रस्तुत दृष्टिकोण पर सवाल उठाए।
भारत के बयान में पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति के साथ-साथ आतंकवाद के पीड़ितों के अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े व्यापक सवाल भी शामिल रहे।
कोविड-19 रिपोर्ट के दृष्टिकोण पर भारत की आपत्ति
भाविका मंगलानंदन ने रिपोर्ट के उस दृष्टिकोण पर सवाल उठाया, जिसके बारे में भारत का कहना था कि महामारी के दौरान धार्मिक भेदभाव और व्यवस्थागत कमियों के लिए ग्लोबल साउथ के देशों को अधिक जिम्मेदार ठहराया गया, जबकि विकसित देशों में सामने आई समान परिस्थितियों को पर्याप्त रूप से महत्व नहीं दिया गया।
भारतीय राजनयिक ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ी रिपोर्टों में सभी क्षेत्रों की घटनाओं का निष्पक्ष आकलन होना चाहिए। उनके अनुसार, मानवीय पीड़ा और नुकसान को राजनीतिक उद्देश्यों के लिए चुनिंदा ढंग से प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।
भारत ने इस बात पर जोर दिया कि धार्मिक स्वतंत्रता जैसे संवेदनशील विषयों पर तैयार की जाने वाली रिपोर्टों में समान मानदंड अपनाए जाने चाहिए। हालांकि, रिपोर्ट के आकलन को लेकर भारत की आपत्ति उसका आधिकारिक पक्ष है; इससे अपने आप यह साबित नहीं होता कि रिपोर्ट में जानबूझकर किसी क्षेत्र की घटनाओं की अनदेखी की गई।
आतंकवादियों के अधिकारों और पीड़ितों के न्याय का मुद्दा
भारतीय प्रतिनिधि ने आतंकवादियों के अंतिम संस्कार के अधिकारों पर रिपोर्ट के रुख को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने तर्क दिया कि आतंकवादी हमलों में मारे गए निर्दोष लोगों के अधिकारों और पीड़ा को भी उतना ही महत्व मिलना चाहिए।
मंगलानंदन ने कहा कि आतंकवाद केवल लोगों की जान नहीं लेता, बल्कि समाज और राष्ट्र पर भी गहरा असर डालता है। उनके अनुसार, आतंकवादियों के अधिकारों की चर्चा करते समय उन लोगों के अधिकारों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए, जो आतंकवादी हिंसा के शिकार हुए हैं।
भारत की आपत्ति का केंद्र यह था कि मानवाधिकारों पर चर्चा में आतंकवाद के पीड़ितों के जीवन और सुरक्षा के अधिकार को भी प्रमुखता दी जाए। यह बहस धार्मिक स्वतंत्रता, अंतिम संस्कार की परंपराओं और आतंकवाद के संदर्भ में मानवाधिकारों की व्याख्या से जुड़ी हुई है।
कारगिल युद्ध का जिक्र कर पाकिस्तान पर साधा निशाना
अपने वक्तव्य में भाविका मंगलानंदन ने 1999 के कारगिल संघर्ष का भी उल्लेख किया। उन्होंने पाकिस्तान के उस समय के रवैये पर सवाल उठाते हुए कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता और मृतकों के अंतिम संस्कार के अधिकारों पर इस्लामाबाद की मौजूदा टिप्पणियों को उसके ऐतिहासिक रिकॉर्ड के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए।
भारतीय राजनयिक ने कहा कि कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सेना ने कई पाकिस्तानी सैनिकों के शवों को सैन्य सम्मान के साथ और इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार दफनाया था। उन्होंने इस उदाहरण का हवाला देकर पाकिस्तान के रुख में विरोधाभास होने का आरोप लगाया।
यह टिप्पणी भारत की ओर से रखे गए तर्क का हिस्सा थी। कारगिल युद्ध का उल्लेख करते हुए भारत ने धार्मिक रीति-रिवाजों और मृतकों के सम्मान के सवाल को वर्तमान मानवाधिकार चर्चा से जोड़ा।
जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर भी भारत का जवाब
भाविका मंगलानंदन ने जम्मू-कश्मीर का जिक्र करते हुए पाकिस्तान को उसके कब्जे वाले क्षेत्रों की स्थिति पर ध्यान देने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को भारतीय केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर पर टिप्पणी करने के बजाय अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में हो रही घटनाओं पर ध्यान देना चाहिए।
इस बयान में रावलकोट का भी उल्लेख किया गया। भारत ने पाकिस्तान के रुख पर सवाल उठाते हुए कहा कि उसे अपने कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर के हिस्सों में विकास और वहां के लोगों की स्थिति पर ध्यान देना चाहिए।
जम्मू-कश्मीर का मुद्दा लंबे समय से भारत और पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक विवाद का हिस्सा रहा है। संयुक्त राष्ट्र में इस मुद्दे पर दोनों देशों के रुख अलग-अलग रहे हैं। भारत का कहना है कि जम्मू-कश्मीर उसका अभिन्न हिस्सा है, जबकि पाकिस्तान इस क्षेत्र को लेकर अलग दावा करता है।
पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर भारत की चिंता
भारत ने पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि वहां अल्पसंख्यक समुदायों की संख्या में गिरावट और उनके अधिकारों के उल्लंघन से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देने की जरूरत है।
भाविका मंगलानंदन ने कहा कि जो देश अपने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकता, उसे भारत को इस विषय पर उपदेश देने का नैतिक अधिकार नहीं होना चाहिए। यह टिप्पणी पाकिस्तान में धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर भारत की ओर से उठाई गई आपत्तियों का हिस्सा थी।
भारत की टिप्पणियां ऐसे समय आईं, जब पाकिस्तान में धार्मिक भेदभाव और कथित जबरन धर्म परिवर्तन को लेकर चिंताएं फिर चर्चा में थीं। रिपोर्ट में द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के हवाले से सिंध प्रांत में आयोजित एक अंतर-धार्मिक संवाद का उल्लेख किया गया, जहां प्रतिभागियों ने हिंदू लड़कियों के कथित अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और विवाह से जुड़े मामलों पर चिंता जताई थी।
इन प्रतिभागियों ने धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा से संबंधित कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन का मुद्दा भी उठाया। हालांकि, इन घटनाओं और आरोपों के अलग-अलग मामलों की पुष्टि के लिए संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड और स्वतंत्र स्रोतों को देखना जरूरी है।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के बयान का व्यापक संदर्भ
संयुक्त राष्ट्र में भारत के वक्तव्य में कई मुद्दे एक साथ उठाए गए—धार्मिक स्वतंत्रता, महामारी के दौरान भेदभाव का आकलन, आतंकवाद के पीड़ितों के अधिकार, मृतकों के अंतिम संस्कार की परंपराएं और पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति।
भारत ने रिपोर्ट के दृष्टिकोण पर आपत्ति जताते हुए कहा कि मानवाधिकारों के आकलन में निष्पक्षता और समान मानदंड जरूरी हैं। साथ ही, भारतीय प्रतिनिधि ने पाकिस्तान के अल्पसंख्यक अधिकारों के रिकॉर्ड को लेकर सवाल उठाए।
इस पूरे घटनाक्रम में भारत का मुख्य संदेश यह रहा कि धार्मिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों पर चर्चा करते समय सभी देशों को अपने रिकॉर्ड की भी समीक्षा करनी चाहिए। दूसरी ओर, रिपोर्ट पर भारत की आपत्तियों और पाकिस्तान के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संबंधित पक्षों के बयानों के संदर्भ में समझना जरूरी है।
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