“लखनऊ विश्वविद्यालय में फीस वृद्धि के विरोध में धरना देने पहुंचे छात्र संगठनों ने पुलिस हिरासत और प्रशासनिक दमन का आरोप लगाया। AISA, NSUI समेत कई संगठनों ने फीस वृद्धि वापस लेने की मांग की।“
लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय में फीस वृद्धि और शिक्षा के बाजारीकरण के विरोध में मंगलवार को छात्रों और विभिन्न छात्र संगठनों ने प्रदर्शन किया। इस दौरान आइसा, एनएसयूआई और एससीएस से जुड़े छात्रों ने आरोप लगाया कि गेट संख्या-1 पर प्रस्तावित शांतिपूर्ण धरना शुरू होने से पहले ही पुलिस बुलाकर छात्रों को हिरासत में लिया गया।
छात्र संगठनों का कहना है कि वे फीस वृद्धि, स्ववित्तपोषित सीटों के विस्तार और शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराने पहुंचे थे। लेकिन धरना शुरू होने से पहले ही प्रशासनिक हस्तक्षेप कर प्रदर्शन रोक दिया गया।
प्रॉक्टर पर लगाए गंभीर आरोप
प्रदर्शनकारी छात्रों ने विश्वविद्यालय के प्रॉक्टर राकेश द्विवेदी पर आरोप लगाया कि उनके निर्देश पर पुलिस कार्रवाई की गई। छात्रों ने इसे पूर्वनियोजित दमनात्मक कदम बताते हुए कहा कि प्रशासन छात्रों की आवाज दबाने की कोशिश कर रहा है।
हालांकि, इस मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

फीस वृद्धि बना मुख्य मुद्दा
छात्र संगठनों ने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय में हाल ही में कई पाठ्यक्रमों की फीस में भारी बढ़ोतरी की गई है। उनके अनुसार कुछ पाठ्यक्रमों में फीस 40 प्रतिशत से लेकर 200 प्रतिशत तक बढ़ाई गई है। साथ ही बड़ी संख्या में स्ववित्तपोषित सीटें जोड़ी गई हैं।
छात्र नेताओं का कहना है कि इससे आर्थिक रूप से कमजोर, ग्रामीण, दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक और प्रथम पीढ़ी के विद्यार्थियों पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा।
छात्र नेताओं ने क्या कहा
आइसा इकाई के अध्यक्ष शान्तम ने कहा कि फीस वृद्धि पर सवाल उठाने पर छात्रों को जवाब देने के बजाय हिरासत में लिया जा रहा है।
एनएसयूआई के राष्ट्रीय समन्वयक प्रिंस प्रकाश ने कहा कि यह केवल एक विश्वविद्यालय का मुद्दा नहीं, बल्कि देशभर में शिक्षा के निजीकरण की दिशा का संकेत है।
एससीएस के तौकील गाजी ने कहा कि फीस वृद्धि और स्ववित्तपोषित मॉडल समाज के वंचित वर्गों को उच्च शिक्षा से दूर कर रहा है।
आंदोलन तेज करने की चेतावनी
छात्र संगठनों ने कहा है कि यदि फीस वृद्धि वापस नहीं ली गई और छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों का सम्मान नहीं किया गया तो आंदोलन और व्यापक किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि यह संघर्ष केवल फीस के खिलाफ नहीं, बल्कि शिक्षा के अधिकार और विश्वविद्यालय के लोकतांत्रिक चरित्र को बचाने की लड़ाई है।
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