‘स्पेशल कोर्ट सिस्टम मजाक बन गया’: सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, राज्यों से मांगा जवाब

जजों पर बढ़ते बोझ और लंबित मामलों पर चिंता; कहा—विशेष अदालतें सिर्फ तय मामलों की ही करें सुनवाई

“सुप्रीम कोर्ट ने स्पेशल कोर्ट सिस्टम पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मजाक बन गया है। कोर्ट ने जजों पर बढ़ते बोझ और UAPA मामलों में देरी पर चिंता जताई और राज्यों को सुधार के निर्देश दिए।”

हाइलाइट्स:

  • सुप्रीम कोर्ट ने स्पेशल कोर्ट सिस्टम पर उठाए सवाल
  • कहा—सिर्फ विशेष मामलों की ही करें सुनवाई
  • जजों पर बढ़ते बोझ और देरी पर चिंता
  • UAPA मामलों में लंबित केसों को लेकर सख्ती
  • राज्यों से मांगा पूरा ब्योरा और सुधार की योजना

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अदालतों (स्पेशल कोर्ट) के कामकाज को लेकर कड़ी टिप्पणी करते हुए मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। अदालत ने कहा कि स्पेशल कोर्ट सिस्टम कई जगह “मजाक” बनकर रह गया है, क्योंकि इन अदालतों को उनके निर्धारित मामलों के अलावा सामान्य केस भी दिए जा रहे हैं।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि विशेष अदालतों का उद्देश्य खास कानूनों से जुड़े मामलों का त्वरित निपटारा करना है, लेकिन जजों पर अतिरिक्त बोझ डालने से यह मकसद पूरा नहीं हो पा रहा।

अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया कि स्पेशल कोर्ट को केवल उन्हीं मामलों की सुनवाई करनी चाहिए, जिनके लिए उन्हें बनाया गया है। सामान्य सिविल और आपराधिक मामलों का बोझ इन अदालतों से हटाया जाना चाहिए, ताकि न्याय प्रक्रिया तेज हो सके।

कोर्ट ने यह भी कहा कि विशेष अदालतों में रोजाना सुनवाई सुनिश्चित की जाए और इन्हें न्यायालय परिसरों के पास स्थापित किया जाए, जिससे मामलों का निपटारा तेजी से हो सके। इसके लिए अतिरिक्त स्टाफ और प्रशिक्षित न्यायाधीशों की नियुक्ति पर भी जोर दिया गया।

UAPA मामलों पर चिंता:
अदालत ने UAPA जैसे गंभीर मामलों की सुनवाई में देरी पर चिंता जताई। सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि कई राज्यों में ऐसे मामलों को अलग विशेष अदालतों के बजाय जिला जज ही देख रहे हैं, जिससे लंबित मामलों की संख्या बढ़ रही है।

कोर्ट ने कहा कि जब जज अलग-अलग तरह के मामलों में उलझे रहते हैं, तो विशेष मामलों में तेजी से सुनवाई संभव नहीं हो पाती, जिसका खामियाजा अंडरट्रायल कैदियों को भुगतना पड़ता है।

अदालत ने राज्यों से लंबित मामलों का पूरा ब्योरा मांगा है और पूछा है कि इन मामलों को एक साल के भीतर निपटाने के लिए कितनी अतिरिक्त अदालतों और संसाधनों की जरूरत होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका उद्देश्य किसी सरकार को दोष देना नहीं, बल्कि न्याय में हो रही देरी को दूर करना और अंडरट्रायल कैदियों के अधिकारों की रक्षा करना है।

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