यूपी में नजूल संपत्तियों का नए सिरे से होगा सर्वे, योगी सरकार ने दिया एक महीने का समय

उत्तर प्रदेश में नजूल संपत्तियों का नए सिरे से सर्वे होगा। योगी सरकार ने एक महीने में अवैध कब्जों, फ्रीहोल्ड संपत्तियों और लंबित मामलों की रिपोर्ट मांगी है।

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में नजूल संपत्तियों को लेकर योगी सरकार ने एक बार फिर प्रक्रिया तेज कर दी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में बुधवार को हुई बैठक में प्रदेशभर की नजूल संपत्तियों का नए सिरे से सर्वे कराने का निर्णय लिया गया। सर्वे के दौरान यह पता लगाया जाएगा कि कितनी नजूल भूमि पर अवैध कब्जे हैं, कितनी संपत्तियां फ्रीहोल्ड की जा चुकी हैं और कितने मामले अदालतों में लंबित हैं।

आवास एवं शहरी नियोजन विभाग के अधिकारियों को एक महीने के भीतर सर्वे पूरा कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। रिपोर्ट सामने आने के बाद नजूल संपत्तियों से संबंधित विधेयक में संशोधन को लेकर प्रवर समिति की अगली बैठक होगी। माना जा रहा है कि संशोधन प्रस्ताव को विधान परिषद के आगामी शीतकालीन सत्र में रखा जा सकता है।

करीब दो लाख करोड़ रुपये की नजूल संपत्ति होने का अनुमान

प्रदेश में लगभग 75 हजार एकड़ नजूल भूमि होने का अनुमान है। इसकी अनुमानित कीमत करीब दो लाख करोड़ रुपये बताई जा रही है। सरकार अब इसका विस्तृत ब्योरा जुटाकर नजूल संपत्तियों की मौजूदा स्थिति स्पष्ट करना चाहती है।

मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि सर्वे में अवैध कब्जों के साथ-साथ नजूल भूमि से जुड़े न्यायालयों में लंबित मामलों की भी जानकारी जुटाई जाए। उन्होंने सर्वे की प्रक्रिया में किसी भी तरह की गड़बड़ी न होने देने की हिदायत दी है।

प्रवर समिति की पहली बैठक में हुआ प्रस्तुतीकरण

उत्तर प्रदेश नजूल संपत्ति (लोक प्रयोजनार्थ प्रबंध और उपयोग) विधेयक-2024 को लेकर बुधवार को विधानभवन के कक्ष संख्या-77 में प्रवर समिति की पहली बैठक हुई। आवास विभाग की ओर से समिति के सामने नजूल संपत्तियों को लेकर विस्तृत प्रस्तुतीकरण दिया गया।

विधेयक को विधान परिषद में संशोधन के लिए प्रवर समिति के पास भेजा गया था। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में गठित नौ सदस्यीय समिति में डॉ. जयपाल सिंह व्यस्त, लालजी प्रसाद निर्मल, डॉ. प्रज्ञा त्रिपाठी, डॉ. पीके श्रीवास्तव, आशुतोष सिन्हा, विच्छे लाल राम, योगेश चौधरी, ध्रुव कुमार त्रिपाठी और राजबहादुर सिंह चंदेल शामिल हैं।

गरीबों और वर्षों से रह रहे लोगों के हितों की रक्षा पर जोर

समिति की बैठक में सपा सदस्य आशुतोष सिन्हा ने विधेयक में संशोधन का प्रस्ताव रखते हुए कहा कि कानून ऐसा होना चाहिए, जिसमें वर्षों से वैध रूप से रह रहे नागरिकों, पट्टेदारों, गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के हितों की रक्षा हो। इसके साथ ही सरकारी संपत्तियों की सुरक्षा और पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए।

राजबहादुर चंदेल ने नजूल भूमि के बेहतर उपयोग का सुझाव दिया। वहीं विधान परिषद में नेता सदन केशव प्रसाद मौर्य ने विधेयक को जन उपयोगी बताया। सभी सदस्यों के सुझावों के बाद मुख्यमंत्री ने प्रदेशभर की नजूल संपत्तियों का नए सिरे से सर्वे कराने का निर्देश दिया।

हर संशोधन प्रस्ताव का होगा कानूनी परीक्षण

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों से कहा कि नजूल संपत्तियों से जुड़े प्रत्येक संशोधन प्रस्ताव का विधिक आधार पर परीक्षण किया जाए। परीक्षण के बाद प्रस्तावों को अगली बैठक में प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं।

सरकार की ओर से लंबे समय से यह तर्क दिया जाता रहा है कि पूर्व की सरकारों के दौरान बड़ी मात्रा में नजूल संपत्तियों को कम कीमत पर फ्रीहोल्ड किया गया। प्रस्तावित कानून के जरिए नजूल भूमि के उपयोग को सार्वजनिक और विकास कार्यों तक सीमित करने की दिशा में कदम उठाने की बात कही गई है।

फ्रीहोल्ड के लिए जमा रकम लौटाने का भी प्रस्ताव

प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार जिस नजूल भूमि को फ्रीहोल्ड कराने के लिए रकम जमा की गई है, उसे वापस करने का प्रावधान भी प्रस्ताव में रखा गया है। वहीं लीज की अवधि समाप्त होने के बाद भी यदि पट्टाधारी जमीन पर कब्जा बनाए रखता है तो जिलाधिकारी को उससे निर्धारित किराया वसूलने का अधिकार दिए जाने की बात कही गई है।

नजूल भूमि के स्वामित्व और उपयोग से जुड़े मामलों में सरकार की ओर से पारदर्शी व्यवस्था बनाने पर जोर दिया जा रहा है।

अखिलेश यादव ने विधेयक को लेकर सरकार पर साधा था निशाना

नजूल भूमि को लेकर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव सरकार पर पहले ही निशाना साध चुके हैं। उनका आरोप रहा है कि नजूल जमीन विधेयक भाजपा से जुड़े कुछ लोगों के व्यक्तिगत फायदे के लिए लाया जा रहा है। उन्होंने गोरखपुर में ऐसी जमीनों का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया था कि कुछ लोग अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करने के लिए इन संपत्तियों पर कब्जा करना चाहते हैं।

नजूल भूमि पर अवैध कब्जे का पुराना विवाद

नजूल भूमि पर फर्जी दस्तावेजों और प्रभाव के आधार पर कब्जे तथा उसे फ्रीहोल्ड कराने के आरोप लंबे समय से सामने आते रहे हैं। वर्ष 1993 में पूर्व गृह सचिव एनएन वोहरा की अध्यक्षता में गठित समिति की रिपोर्ट में भी संगठित गिरोहों और अचल संपत्तियों से जुड़े अपराधों को लेकर चिंता जताई गई थी।

प्रदेश के प्रयागराज, लखनऊ, कानपुर, अयोध्या, वाराणसी, सुलतानपुर, गोंडा और बाराबंकी सहित कई शहरों में नजूल भूमि का बड़ा हिस्सा बताया जाता है। प्रयागराज के सिविल लाइंस क्षेत्र में भी बड़ी मात्रा में भूमि नजूल संपत्ति के रूप में दर्ज होने की बात कही जाती है।

क्या होती है नजूल भूमि?

नजूल भूमि का इतिहास ब्रिटिश शासन के दौर से जुड़ा है। अंग्रेजी शासन के दौरान विद्रोह करने वाले लोगों, राजाओं और अन्य लोगों की कई संपत्तियां जब्त कर ली गई थीं। इसके अलावा ऐसे लोग जो अपना शहर या गांव छोड़कर चले गए और वापस नहीं लौटे, उनकी जमीनें भी सरकारी नियंत्रण में चली गईं।

आजादी के बाद ऐसी कई संपत्तियों के मूल दावेदार या उनके उत्तराधिकारी सामने नहीं आए। ऐसी जमीनों का स्वामित्व सरकार के पास रहा और उन्हें नजूल भूमि के रूप में प्रबंधित किया गया। वर्तमान में इन जमीनों के उपयोग, पट्टे, फ्रीहोल्ड और कब्जे को लेकर अलग-अलग स्तर पर मामले सामने आते रहे हैं। इसी को देखते हुए सरकार अब प्रदेशभर में नजूल संपत्तियों का नए सिरे से सर्वे कराने जा रही है।

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