“लखनऊ के अलीगंज स्थित एनिमेशन ट्रेनिंग सेंटर अग्निकांड में जान गंवाने वाले 15 लोगों की मौत धुएं और कार्बन मोनोआक्साइड गैस से दम घुटने के कारण हुई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बड़ा खुलासा हुआ है। जानिए हादसे की पूरी रिपोर्ट और विशेषज्ञों की राय।“
लखनऊ। राजधानी के अलीगंज स्थित एनिमेशन ट्रेनिंग सेंटर में हुए भीषण अग्निकांड में जान गंवाने वाले सभी 15 लोगों की मौत आग की लपटों से नहीं, बल्कि जहरीले धुएं और कार्बन मोनोआक्साइड गैस के कारण दम घुटने से हुई थी। मंगलवार को आई पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने हादसे की भयावह सच्चाई उजागर कर दी। रिपोर्ट के अनुसार अधिकांश मृतकों के शरीर पर गंभीर जलने के निशान नहीं मिले, जबकि फेफड़ों और श्वसन तंत्र में धुएं के कण पाए गए हैं।
यह खुलासा इस बात की पुष्टि करता है कि आग लगने के बाद इमारत के भीतर फैले घने धुएं और जहरीली गैसों ने कुछ ही मिनटों में लोगों को बेहोश कर दिया था, जिससे वे बाहर निकलने का मौका तक नहीं पा सके।
धुएं ने छीनी सांसें, मौत बन गई कार्बन मोनोआक्साइड
पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक आग लगने के बाद भवन के अंदर तेजी से धुआं भर गया था। इमारत में पर्याप्त निकास व्यवस्था नहीं होने और अधिकांश हिस्से बंद होने के कारण लोग अंदर ही फंस गए। धुएं में मौजूद कार्बन मोनोआक्साइड गैस ने उनके शरीर में ऑक्सीजन की आपूर्ति रोक दी।
विशेषज्ञों के अनुसार कार्बन मोनोआक्साइड गैस रक्त में मौजूद हीमोग्लोबिन से ऑक्सीजन की तुलना में कई गुना तेजी से जुड़ जाती है। इससे कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन बनता है और शरीर के महत्वपूर्ण अंगों तक ऑक्सीजन पहुंचनी बंद हो जाती है। परिणामस्वरूप व्यक्ति बेहोश हो जाता है और कुछ ही समय में उसकी मृत्यु हो सकती है।
15 से 20 मिनट के भीतर थम गईं सांसें
सूत्रों के अनुसार हादसे के दौरान जहरीले धुएं और गैसों के संपर्क में आने के बाद अधिकांश लोगों की सांसें 15 से 20 मिनट के भीतर थम गईं। रिपोर्ट में बताया गया है कि आग के दौरान अंदर मौजूद लोगों के पास बाहर निकलने का पर्याप्त समय नहीं था। धुएं का घनत्व इतना अधिक था कि कई लोग कुछ ही मिनटों में बेहोश हो गए।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब किसी बंद इमारत में आग लगती है तो वहां ऑक्सीजन का स्तर तेजी से गिरता है और विषैली गैसों का स्तर बढ़ जाता है। ऐसे में व्यक्ति के लिए सामान्य रूप से सांस लेना भी असंभव हो जाता है।
किसी मृतक के शरीर पर नहीं मिले गंभीर जलने के निशान
पोस्टमार्टम रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि किसी भी मृतक के शरीर पर ऐसे गंभीर जलने के निशान नहीं पाए गए जो मृत्यु का प्रत्यक्ष कारण बन सकते थे। इससे स्पष्ट होता है कि मौत की मुख्य वजह आग की लपटें नहीं, बल्कि धुएं और जहरीली गैसों का प्रभाव था।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि धुएं और अत्यधिक गर्मी के कारण कई लोगों की श्वास नली प्रभावित हुई थी। इससे श्वसन तंत्र में सूजन आ गई और सांस लेने की क्षमता समाप्त हो गई।
प्लास्टिक और पीवीसी का धुआं बना जानलेवा
लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष प्रो. अजय कुमार वर्मा के अनुसार आग लगने पर प्लास्टिक, विद्युत वायरिंग, फर्नीचर, फोम, सिंथेटिक कपड़े और पीवीसी पाइप जैसे पदार्थों के जलने से अत्यंत जहरीली गैसें निकलती हैं। इनमें हाइड्रोजन क्लोराइड, कार्बन मोनोआक्साइड और अन्य विषैले रसायन शामिल होते हैं।
उन्होंने बताया कि बंद कमरों या हॉल में इन गैसों का प्रभाव और अधिक घातक हो जाता है। व्यक्ति को पहले आंखों में जलन, घबराहट और सांस लेने में परेशानी होती है। इसके बाद चक्कर आने लगते हैं और कुछ ही मिनटों में वह बेहोश हो सकता है।
बंद इमारत बनी मौत का जाल
विशेषज्ञों का मानना है कि इस हादसे में इमारत की संरचना भी बड़ी वजह बनी। भवन चारों ओर से बंद था और बाहर निकलने के पर्याप्त रास्ते नहीं थे। आग लगने के बाद धुआं तेजी से पूरे परिसर में फैल गया। ऑक्सीजन की कमी और जहरीले कणों के फेफड़ों में पहुंचने से लोगों की जान बचाना मुश्किल हो गया।
बताया जा रहा है कि यदि भवन में पर्याप्त आपातकालीन निकास और अग्नि सुरक्षा व्यवस्था होती तो कई लोगों की जान बचाई जा सकती थी।
हादसे ने खड़े किए सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल
अलीगंज अग्निकांड ने एक बार फिर राजधानी में व्यावसायिक भवनों और कोचिंग संस्थानों की अग्नि सुरक्षा व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि हादसे में मौतें आग की लपटों से नहीं, बल्कि सुरक्षा मानकों की अनदेखी और जहरीले धुएं के कारण हुईं।
अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि भवन में अग्निशमन मानकों का कितना पालन किया गया था और किन लापरवाहियों के कारण 15 लोगों की जान चली गई। वहीं मृतकों के परिवारों में शोक और आक्रोश का माहौल बना हुआ है, जो इस दर्दनाक हादसे के जिम्मेदार लोगों पर कठोर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
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