“उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भाजपा ने बूथ पालक और शक्ति केंद्र आधारित नई रणनीति तैयार की है। वाराणसी में 203 शक्ति केंद्र और 1264 बूथ पालकों के जरिए संगठन को मजबूत करने की कवायद तेज हो गई है। जानिए BJP का स्मार्ट प्लान और चुनावी गणित।“
वाराणसी। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 भले ही अभी दूर हों, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। सत्तारूढ़ भाजपा ने भी संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने के लिए नई रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। पार्टी का फोकस इस बार बूथ पालक और शक्ति केंद्र मॉडल के जरिए जमीनी स्तर पर पकड़ मजबूत करने पर है। खास बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी को इस रणनीति का प्रमुख केंद्र बनाया गया है।
भाजपा का मानना है कि चुनाव केवल प्रचार से नहीं, बल्कि बूथ स्तर पर मजबूत संगठन और कार्यकर्ताओं के नेटवर्क से जीते जाते हैं। यही कारण है कि पार्टी ने अभी से 2027 के चुनावी रण के लिए अपने संगठनात्मक ढांचे को और धार देना शुरू कर दिया है।
2022 और 2024 के चुनावी आंकड़ों से लिया सबक
भाजपा के लिए वाराणसी हमेशा से प्रतिष्ठा की सीट रही है, लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को अपेक्षा से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा था।
वाराणसी दक्षिण विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी थी, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जीत का अंतर भी पहले की तुलना में कम हुआ था। विपक्ष ने इसे अपनी राजनीतिक मजबूती के संकेत के रूप में पेश किया था।
इन्हीं अनुभवों को देखते हुए भाजपा ने संगठनात्मक स्तर पर नई रणनीति तैयार की है।
क्या है शक्ति केंद्र मॉडल?
भाजपा के महानगर अध्यक्ष प्रदीप अग्रहरि के अनुसार वाराणसी महानगर में तीन विधानसभा क्षेत्र, 13 मंडल और 61 कार्य समितियां हैं। पार्टी ने यहां 203 शक्ति केंद्र बनाए हैं, जिनमें प्रत्येक शक्ति केंद्र के अंतर्गत सात से आठ बूथ आते हैं।
शक्ति केंद्र वह इकाई है जहां पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का अनुभव और युवा कार्यकर्ताओं की ऊर्जा मिलकर काम करती है। इन केंद्रों के माध्यम से सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने के साथ-साथ स्थानीय मुद्दों पर भी फीडबैक लिया जाता है।
ए, बी और सी प्लान पर काम कर रही भाजपा
भाजपा ने अपने विस्तार अभियान को तीन स्तरों में विभाजित किया है।
- प्लान ए: पार्टी से पहले से जुड़े कार्यकर्ताओं और समर्थकों को सक्रिय और संगठित बनाए रखना।
- प्लान बी: ऐसे लोगों को पार्टी से जोड़ना जो भाजपा की विचारधारा से सहमत हैं लेकिन अभी संगठन का हिस्सा नहीं हैं।
- प्लान सी: ऐसे मतदाताओं और समर्थकों तक पहुंच बनाना जो फिलहाल दूसरे राजनीतिक दलों के साथ जुड़े हुए हैं।
पार्टी का मानना है कि इस रणनीति से सामाजिक और राजनीतिक आधार को और व्यापक बनाया जा सकता है।
हर महीने हो रही बैठकें
भाजपा संगठन ने नियमित समीक्षा और रणनीति निर्माण के लिए मासिक बैठकों की व्यवस्था भी की है। पहले सप्ताह में मंडल स्तर, दूसरे सप्ताह में महानगर स्तर और तीसरे सप्ताह में शक्ति केंद्र स्तर पर बैठकें आयोजित की जाती हैं।
इन बैठकों में बूथ अध्यक्षों, शक्ति केंद्र प्रमुखों और वरिष्ठ पदाधिकारियों की भागीदारी होती है। वहीं चौथे रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम को सामूहिक रूप से सुनने और चर्चा करने की परंपरा भी जारी रखी गई है।
1264 बूथों पर तैनात किए गए बूथ पालक
भाजपा की चुनावी रणनीति में बूथ पालकों की भूमिका बेहद अहम मानी जा रही है। वाराणसी महानगर में कुल 1264 बूथ हैं और प्रत्येक बूथ के लिए एक बूथ पालक नियुक्त किया गया है।
पार्टी के अनुसार बूथ अध्यक्ष आमतौर पर युवा कार्यकर्ता होते हैं, जबकि बूथ पालक के रूप में अनुभवी नेताओं और वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी दी जाती है। इनका काम बूथ स्तर पर संगठन को सक्रिय रखना, कार्यकर्ताओं के साथ समन्वय बनाना और मतदाताओं से संपर्क बनाए रखना है।
विपक्ष के PDA फार्मूले पर भी भाजपा की नजर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि समाजवादी पार्टी जहां PDA (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) सामाजिक समीकरण के सहारे चुनावी रणनीति बना रही है, वहीं भाजपा इस समीकरण को चुनौती देने के लिए सामाजिक विस्तार और संगठनात्मक मजबूती दोनों पर एक साथ काम कर रही है।
भाजपा ने विभिन्न सामाजिक वर्गों के प्रतिनिधियों को संगठन और सरकार में स्थान देकर अपने समर्थन आधार को व्यापक बनाने की कोशिश शुरू कर दी है।
संगठन की मजबूती पर भाजपा का भरोसा
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका संगठन और बूथ स्तर तक फैला कार्यकर्ता नेटवर्क रहा है। पार्टी पहले भी इसी मॉडल के जरिए कई चुनावों में सफलता हासिल कर चुकी है।
हालांकि 2027 के चुनाव में अभी काफी समय बाकी है और राजनीतिक परिस्थितियां बदल सकती हैं, लेकिन भाजपा ने स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि वह चुनावी मैदान में उतरने से पहले संगठनात्मक तैयारी में कोई कमी नहीं छोड़ना चाहती।
प्रदेश की राजनीति में जहां एक ओर विपक्ष सामाजिक समीकरणों और गठबंधन की रणनीति पर काम कर रहा है, वहीं भाजपा ने एक बार फिर अपने पारंपरिक बूथ मैनेजमेंट और संगठनात्मक मजबूती के मॉडल पर भरोसा जताया है। आने वाले महीनों में यह रणनीति उत्तर प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती नजर आ सकती है।
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